श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 64: राजा नृग का उद्धार  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  10.64.25 
ब्रह्मण्यस्य वदान्यस्य तव दासस्य केशव ।
स्मृतिर्नाद्यापि विध्वस्ता भवत्सन्दर्शनार्थिन: ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
हे केशव, आपका दास होने के नाते मैं ब्राह्मणों की भक्ति करता था और उनके प्रति उदार था, और मैं सदैव आपके दर्शन के लिए इच्छुक था। इसलिए आज तक मैं (अपने पिछले जीवन को) भूला नहीं हूँ।
 
O Kesava, as your servant I was a devotee of the brahmanas and was generous to them and I was always eager to see you. That is why till today I have not been able to forget (my past life).
तात्पर्य
श्रील जीव गोस्वामी ने इस पद पर इस प्रकार टीका की है: ‘‘चूँकि नृग ने खुलेआम यह घोषणा की कि उसके दो असाधारण गुण हैं-जो कि ब्राह्मणों के प्रति समर्पण और उदारता हैं-ऐसा स्पष्ट है कि ये गुण उसके पास आंशिक रूप से ही थे क्योंकि जो पूर्णतः शुद्ध है वह अपने गुणों का बखान नहीं करेगा। यह भी स्पष्ट है कि नृग ऐसे धर्म को अलग लक्ष्य मानता था जो अपने-आपमें ही श्रेष्ठ है। इस तरह वह भगवान श्री कृष्ण के लिए विशुद्ध भक्ति की पूरी तरह सराहना नहीं कर पाया। कृष्ण नृग के जीवन का एकमात्र लक्ष्य नहीं थे जैसे कि नियमित साधना के चरण में ही अम्बरीष महाराज के लिए थे। न ही हम यह देखते हैं कि जब दुर्वासा मुनि उनसे नाराज़ हुए थे तब नृग ने अम्बरीष जैसी बाधाओं को पार किया हो। फिर भी हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि चूँकि नृग किसी न किसी कारणवश भगवान को देख पाया था तो उसके अंदर ईमानदारी से भगवान के सानिध्य को चाहने का तो शुभ गुण रहा होगा।’’

श्रील प्रभुपाद कृष्ण, परमेश्वर व्यक्तित्व, में ऊपर के विश्लेषण की पुष्टि करते हैं: ‘‘कुल मिलाकर, [नृग] ने कृष्ण चेतना का विकास नहीं किया था। कृष्णभावना व्यक्ति में कृष्ण, भगवान, के प्रेम को विकसित करती है न कि धर्म व अधर्म वाली क्रियाओं के प्रति प्रेम को। इसलिए उस पर ऐसी क्रियाओं के नतीजों का असर नहीं होता है। जैसा कि ब्रह्म-संहिता में कहा गया है, एक भक्त, भगवान की कृपा से कामनाओं की पूर्ति करने वाली क्रियाओं के नतीजों के अधीन नहीं होता है।’’

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ने इस तरह से टीका दी है: ‘‘जब नृग ने ‘वह आपका साक्षात्कार चाहता था’ का जिक्र किया वह एक ऐसी घटना की बात कर रहा था जो एक महान भक्त से जुडी थी जिससे नृग एक बार मिला था। यह भक्त परमेश्वर की सबसे खूबसूरत देवता की एक मंदिर बनाने का बहुत इच्छुक था और वह श्रीमद्-भागवतम जैसे शास्त्रों की प्रतियाँ भी चाहता था। बहुत उदार होने के कारण नृग ने इन चीज़ों का प्रबंध किया और भक्त इतना संतुष्ट हुआ कि उसने राजा को आशीर्वाद दिया: ‘‘मेरे प्रिय राजा, परमेश्वर के साक्षात्कार का सौभाग्य तुम्हें प्राप्त हो।’’ उस समय से नृग ने भगवान को देखने की इच्छा की।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)