श्रील प्रभुपाद कृष्ण, परमेश्वर व्यक्तित्व, में ऊपर के विश्लेषण की पुष्टि करते हैं: ‘‘कुल मिलाकर, [नृग] ने कृष्ण चेतना का विकास नहीं किया था। कृष्णभावना व्यक्ति में कृष्ण, भगवान, के प्रेम को विकसित करती है न कि धर्म व अधर्म वाली क्रियाओं के प्रति प्रेम को। इसलिए उस पर ऐसी क्रियाओं के नतीजों का असर नहीं होता है। जैसा कि ब्रह्म-संहिता में कहा गया है, एक भक्त, भगवान की कृपा से कामनाओं की पूर्ति करने वाली क्रियाओं के नतीजों के अधीन नहीं होता है।’’
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ने इस तरह से टीका दी है: ‘‘जब नृग ने ‘वह आपका साक्षात्कार चाहता था’ का जिक्र किया वह एक ऐसी घटना की बात कर रहा था जो एक महान भक्त से जुडी थी जिससे नृग एक बार मिला था। यह भक्त परमेश्वर की सबसे खूबसूरत देवता की एक मंदिर बनाने का बहुत इच्छुक था और वह श्रीमद्-भागवतम जैसे शास्त्रों की प्रतियाँ भी चाहता था। बहुत उदार होने के कारण नृग ने इन चीज़ों का प्रबंध किया और भक्त इतना संतुष्ट हुआ कि उसने राजा को आशीर्वाद दिया: ‘‘मेरे प्रिय राजा, परमेश्वर के साक्षात्कार का सौभाग्य तुम्हें प्राप्त हो।’’ उस समय से नृग ने भगवान को देखने की इच्छा की।
