श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 63: बाणासुर और भगवान् कृष्ण का युद्ध  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  10.63.45 
अयं ममेष्टो दयितोऽनुवर्ती
मयाभयं दत्तममुष्य देव ।
सम्पाद्यतां तद् भवत: प्रसादो
यथा हि ते दैत्यपतौ प्रसाद: ॥ ४५ ॥
 
 
अनुवाद
यह बाणासुर मेरा बहुत ही प्रिय और आज्ञाकारी अनुयायी है और मैंने इसे निर्भयता का वरदान दिया है। इसलिए, हे प्रभु, इसे अपनी कृपा उसी प्रकार प्रदान करें जिस प्रकार आपने असुरों के राजा प्रह्लाद पर कृपा की थी।
 
This Banasura is my most dear and obedient servant and I have given him protection. Therefore, O Lord, please shower your blessings on him in the same way as you showered your blessings on the demon king Prahlad.
तात्पर्य
भगवान शिव को बाणासुर की मदद करने का मन हुआ क्योंकि दानव ने भगवान शिव के तांडव नृत्य के लिए संगीत सहयोग देने में महान भक्ति दिखाई थी। बाण के भगवान शिव के पक्ष में होने का एक और कारण यह है कि वह महान भक्तों प्रह्लाद और बलि का वंशज है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)