तप्तोऽहं ते तेजसा दु:सहेन
शान्तोग्रेणात्युल्बणेन ज्वरेण ।
तावत्तापो देहिनां तेऽङ्घ्रिमूलं
नो सेवेरन् यावदाशानुबद्धा: ॥ २८ ॥
अनुवाद
मैं आपके उस भयानक ज्वर अस्त्र की दारुण शक्ति से पीडित हूँ जो शीतल होते हुए भी जलाता है। जब तक सब देहधारी प्राणी भौतिक महत्वकांक्षाओं के मोहपाश में बंधे रहेंगे और आपके चरणों की भक्ति से विमुख रहेंगे, तब तक उन्हें कष्ट भोगना पडेगा।
I am tormented by the terrible brilliance of Your dreadful weapon of fever, which is blazing even though it is cool. All embodied beings suffer as long as they are bound by material ambitions and shy away from rendering service to Your lotus feet.
तात्पर्य
पिछले श्लोक में शिवजी ने कहा था कि जो हिंसा से जीते हैं वो ईश्वर के हाथों ऐसी ही हिंसा को सहेंगे। पर यहाँ आगे वो कहते हैं कि जो लोग परम ईश्वर के समक्ष समर्पण नहीं करते वो सज़ा पाने योग्य हैं। हालाँकि शिवजी ने भी इस समय तक हिंसक ही व्यवहार किया था, पर अब चूँकि उन्होंने ईश्वर के समक्ष समर्पण कर लिया है और अपने आप को शुद्ध किया है, वो ईश्वर की दया पाने की आशा करते हैं। दूसरें शब्दों में, अब वो भगवान के भक्त बन गए हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥