श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 62: ऊषा-अनिरुद्ध मिलन  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  10.62.9 
इत्युक्त: कुमतिर्हृष्ट: स्वगृहं प्राविशन्नृप ।
प्रतीक्षन् गिरिशादेशं स्ववीर्यनशनं कुधी: ॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
ऐसी सलाह के बाद, नासमझ बाणासुर खुश हो गया। तत्पश्चात् हे राजन, गिरीश ने जो भविष्यवाणी की थी, उसके विनाश की प्रतीक्षा में, वह अपने घर चला गया।
 
Thus instructed, the ignorant Banasura became pleased. Thereafter, O King, he went to his home to await the destruction of his prowess—what Girish had foretold.
तात्पर्य
यहाँ बाणासुर का वर्णन कु-धी ("बुरा बुद्धि वाला") और कु-मति ("मूर्ख") के रूप में किया गया है क्योंकि वह वास्तविक स्थिति को पूरी तरह से गलत समझ बैठा था। यह राक्षस इतना घमंडी था कि वह आश्वस्त था कि कोई भी उसे हरा नहीं सकता। यह सुनकर उसे खुशी हुई कि भगवान शिव जैसा शक्तिशाली कोई उसके साथ युद्ध करने आएगा और युद्ध की उसकी इच्छा को पूरा करेगा। भले ही शिव ने कहा था कि यह व्यक्ति बाण के झंडे को तोड़ देगा और उसके पराक्रम को नष्ट कर देगा, लेकिन वह राक्षस इस कथन को गंभीरता से लेने के लिए बहुत मूर्ख था और उत्सुकता से लड़ाई का इंतजार कर रहा था।

वर्तमान समय में भौतिकवादी लोग इंद्रिय तृप्ति के लिए अभूतपूर्व सुविधाओं से प्रसन्न हैं। यद्यपि यह स्पष्ट है कि मृत्यु, व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों, जल्दी से उन पर आ रही है, आधुनिक इंद्रिय तृप्त करने वाले अपने आसन्न विनाश के प्रति बेखबर हैं। जैसा कि भागवतम (2.1.4) में कहा गया है, पश्यन्न एपी न पश्यति: भले ही उनका आसन्न विनाश स्पष्ट है, वे इसे देखने के लिए बहुत अंधे हैं, भोग भोग और परिवार के प्रति आसक्ति के कारण नशे में हैं। इसी तरह, बाणासुर अपने भौतिक पराक्रम के नशे में धुत था और विश्वास नहीं कर सकता था कि वह आकार में कटने वाला है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)