श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 62: ऊषा-अनिरुद्ध मिलन  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  10.62.31 
स तं प्रविष्टं वृतमाततायिभि-
र्भटैरनीकैरवलोक्य माधव: ।
उद्यम्य मौर्वं परिघं व्यवस्थितो
यथान्तको दण्डधरो जिघांसया ॥ ३१ ॥
 
 
अनुवाद
बाणासुर को अनेक सशस्त्र रक्षकों सहित घुसते देखकर, अनिरुद्ध ने अपनी लोहे की गदा उठा ली और अपने पर हमला करने वाले पर प्रहार करने के लिए तैयार होकर दृढ़ता से खड़ा हो गया। वह दण्डधारी काल के समान दिखाई दे रहा था।
 
Seeing Banasura entering with many armed guards, Aniruddha picked up his iron mace and stood erect, ready to attack the attacker. He looked like Death himself, holding a stick.
तात्पर्य
क्लब मामूली लोहे का नहीं, मुरु नामक एक विशेष प्रकार के लोहे का था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)