श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 62: ऊषा-अनिरुद्ध मिलन  »  श्लोक 29-30
 
 
श्लोक  10.62.29-30 
कामात्मजं तं भुवनैकसुन्दरं
श्यामं पिशङ्गाम्बरमम्बुजेक्षणम् ।
बृहद्भ‍ुजं कुण्डलकुन्तलत्विषा
स्मितावलोकेन च मण्डिताननम् ॥ २९ ॥
दीव्यन्तमक्षै: प्रिययाभिनृम्णया
तदङ्गसङ्गस्तनकुङ्कुमस्रजम् ।
बाह्वोर्दधानं मधुमल्लिकाश्रितां
तस्याग्र आसीनमवेक्ष्य विस्मित: ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
बाणासुर ने अपने सामने अद्वितीय सुंदरता से युक्त, सांवले रंग का, पीले वस्त्र पहने हुए, कमल के से नेत्र और भयानक भुजाओं वाले कामदेव के पुत्र को देखा। उसका मुखमंडल तेजोमय कुंडल और बालों से, और साथ ही मुस्कुराहट भरी चितवन से सुशोभित था। जब वह अपनी अत्यंत मंगलमय प्रेमिका के सामने बैठा हुआ उसके साथ चौसर खेल रहा था, तो उसकी भुजाओं के बीच में वसंत ऋतु की चमेली की माला लटक रही थी, जिस पर कुमकुम का लेप लगा हुआ था, जो उसके द्वारा उसे आलिंगन करने पर उसके स्तनों से माला में लग गया था। यह सब देखकर बाणासुर चकित था।
 
Banasura saw before him the son of Kamadeva, endowed with matchless beauty, dark complexion, wearing yellow clothes, lotus-like eyes and huge arms. His face was adorned with radiant earrings and hair and smiling glances. When he was sitting in front of his most auspicious beloved and playing Chausar with her, a garland of spring jasmine was hanging between his arms, smeared with kumkum, which had dripped from her breasts into the garland when he embraced her. Banasura was astonished to see all this.
तात्पर्य
अनिरुद्ध के साहस को देखकर बाणासुर आश्चर्यचकित रह गयाः राजकुमार शांति से युवती के कक्ष में बैठा था, बाण की कथित कुंवारी पुत्री के साथ खिलवाड़ कर रहा था! सख्त वैदिक संस्कृति के संदर्भ में, यह एक अविश्वसनीय बात थी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)