श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 62: ऊषा-अनिरुद्ध मिलन  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  10.62.25-26 
तां तथा यदुवीरेण भुज्यमानां हतव्रताम् ।
हेतुभिर्लक्षयां चक्रुरापृईतां दुरवच्छदै: ॥ २५ ॥
भटा आवेदयां चक्रू राजंस्ते दुहितुर्वयम् ।
विचेष्टितं लक्षयाम कन्याया: कुलदूषणम् ॥ २६ ॥
 
 
अनुवाद
अंततः पहरेदारों ने ऊषा में संभोग (सहवास) के अचूक लक्षण देखे जिसने अपना कौमार्य-वचन भंग कर दिया था और यदुवीर द्वारा भोगी जा रही थी तथा जिसमें माधुर्य-सुख के लक्षण प्रकट हो रहे थे। ये पहरेदार बाणासुर के पास गईं और उससे कहा, “हे राजा, हमने आपकी पुत्री में अनुचित आचरण देखा है, जो किसी युवती के परिवार की प्रतिष्ठा को नष्ट-भ्रष्ट करने वाला है।”
 
At last the Rakshasas saw the unmistakable signs of intercourse in Usha who had broken her virginity and was being enjoyed by Yaduvir and was showing signs of sensual pleasure. These Rakshasas went to Banasura and said to him, “O King, we have seen inappropriate conduct in your daughter, which is likely to ruin the reputation of a young girl's family.”
तात्पर्य
श्रील विश्ननाथ चक्रवर्ती ने भटः शब्द को "महिला रक्षक," के रूप में परिभाषित किया है, जबकि जीव गोस्वामी इसे "नपुंसक और अन्य" के रूप में परिभाषित करते हैं। व्याकरणिक रूप से, शब्द दोनों तरह से काम कर सकता है।

रक्षकों को डर था कि अगर बाणासुर को किसी अन्य स्रोत से ऊषा की गतिविधियों के बारे में पता चला, तो वह उन्हें कड़ी सजा देगा, और इस तरह उन्होंने व्यक्तिगत रूप से उसे सूचित किया कि उसकी छोटी बेटी अब अबोध नहीं रही।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)