परार्ध्यवास:स्रग्गन्धधूपदीपासनादिभि: ।
पानभोजनभक्ष्यैश्च वाक्यै: शुश्रूषणार्चित: ॥ २३ ॥
गूढ: कन्यापुरे शश्वत्प्रवृद्धस्नेहया तया ।
नाहर्गणान् स बुबुधे ऊषयापहृतेन्द्रिय: ॥ २४ ॥
अनुवाद
ऊषा ने श्रद्धापूर्वक सेवा द्वारा अनिरुद्ध की पूजा की। उसने अनिरुद्ध को मालाएं, सुगंधियां, धूप, दीपक, बैठने का स्थान आदि देकर उनकी पूजा की। उसने उन्हें पेय, सभी प्रकार के भोजन और मधुर शब्द भी चढ़ाए। इस तरह तरुणियों के कक्ष में छिपे रहते हुए अनिरुद्ध को समय बीतने का कोई ध्यान नहीं रहा। उनकी इंद्रियां ऊषा के प्रति अनुराग से बंध चुकी थीं। ऊषा का अनिरुद्ध के प्रति स्नेह निरंतर बढ़ता ही जा रहा था।
ऊषा ने श्रद्धापूर्वक सेवा द्वारा अनिरुद्ध की पूजा की। उसने अनिरुद्ध को मालाएं, सुगंधियां, धूप, दीपक, बैठने का स्थान आदि देकर उनकी पूजा की। उसने उन्हें पेय, सभी प्रकार के भोजन और मधुर शब्द भी चढ़ाए। इस तरह तरुणियों के कक्ष में छिपे रहते हुए अनिरुद्ध को समय बीतने का कोई ध्यान नहीं रहा। उनकी इंद्रियां ऊषा के प्रति अनुराग से बंध चुकी थीं। ऊषा का अनिरुद्ध के प्रति स्नेह निरंतर बढ़ता ही जा रहा था।