श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 60: रुक्मिणी के साथ कृष्ण का परिहास  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  10.60.40 
जाड्यं वचस्तव गदाग्रज यस्तु भूपान्
विद्राव्य शार्ङ्गनिनदेन जहर्थ मां त्वम् ।
सिंहो यथा स्वबलिमीश पशून् स्वभागं
तेभ्यो भयाद् यदुदधिं शरणं प्रपन्न: ॥ ४० ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु, जिस तरह शेर अपना हक लेने के लिए छोटे जानवरों को भगा देता है, उसी तरह आपने अपने शार्ङ्ग धनुष की आवाज से इकट्ठा हुए राजाओं को भगा दिया और फिर मुझे अपना हिस्सा बना लिया। इसलिए हे गदाग्रज, यह कहना बिल्कुल भी सही नहीं है कि आपने उन राजाओं के डर से समुद्र में शरण ली थी।
 
O Lord, just as a lion drives away the smaller animals to get its fair share of the offerings, similarly you drove away the assembled kings with the twang of your Sharṅga bow and then took me as yours as your fair share. Therefore, O Gadāgraja, it is sheer foolishness on your part to say that you took refuge in the ocean out of fear of those kings.
तात्पर्य
इस अध्याय के श्लोक १२ में भगवान कृष्ण ने कहा है, राजभ्यो बिभ्यत: सुभ्रु समुद्रं शरणं गतान:" राजाओ से भयभीत होकर हम समुद्र की शरण में चले गए।" आचार्यों के अनुसार, भगवान कृष्ण ने अंततः रुक्मिणी के क्रोध को भड़काया और अन्य पुरुषों की महिमा का गुणगान किया जो उनके पति हो सकते थे, और इसलिए एक उत्तेजित मनोदशा में वह यहां उन्हें बताती हैं कि वह अज्ञानी नहीं हैं बल्कि इसके बजाय उन्होंने मूर्खता से बात की है। वह कहती हैं, "एक शेर की तरह तुमने मुझे उन राजाओं की उपस्थिति में अपहरण कर लिया और अपने शारंग धनुष से उन्हें दूर भगा दिया, इसलिए यह कहना मूर्खता है कि उन्हीं राजाओं के डर से तुम समुद्र में चले गए।" श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती के अनुसार, जैसे ही रानी रुक्मिणी ने ये शब्द कहे, उन्होंने भौं चढ़ा दी और प्रभु पर क्रोधित आँखों से देखा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)