श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 60: रुक्मिणी के साथ कृष्ण का परिहास  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  10.60.39 
त्वं न्यस्तदण्डमुनिभिर्गदितानुभाव
आत्मात्मदश्च जगतामिति मे वृतोऽसि ।
हित्वा भवद्भ्रुव उदीरितकालवेग
ध्वस्ताशिषोऽब्जभवनाकपतीन् कुतोऽन्ये ॥ ३९ ॥
 
 
अनुवाद
मैं जानती हूं कि महान ऋषि जिन्होंने संन्यासी का दंड त्याग दिया है, वे आपके यश का बखान करते हैं, कि आप तीनों लोकों के परमात्मा हैं और आप इतने दयालु हैं कि आप अपना सर्वस्व भी दे देते हैं। मैंने ब्रह्मा, शिव और स्वर्ग के शासकों, जिनकी महत्वाकांक्षाएं आपकी भौंहों से उत्पन्न काल के वेग से नष्ट हो जाती हैं, को त्याग कर आपको अपने पति के रूप में चुना है। तो फिर मेरा किसी अन्य विवाहार्थी में क्या हित हो सकता था?
 
Knowing that the great sages who have renounced the discipline of ascetics speak of your glory, that you are the Supreme Being of the three worlds and that you are so generous that you give away even yourself, I have chosen you as my husband, abandoning Brahma, Shiva and the rulers of heaven, whose ambitions are destroyed by the force of time generated by your brow. Then what interest could I have in any other suitor?
तात्पर्य
यह पाठ 16 में भगवान कृष्ण के कथन के लिए रानी रुक्मिणी का खंडन है। वहां भगवान कृष्ण ने कहा, भिक्षुभिः श्लाघिता मुधा: "मैं भिखारियों से गौरवान्वित हूं।" परन्तु रानी रुक्मिणी यह बताती हैं कि वे तथाकथित भिखारी वास्तव में जीवन के परमहंस स्तर में ऋषि हैं - सन्यासी जो आध्यात्मिक उन्नति के उच्चतम स्तर पर पहुंच गए हैं और इस प्रकार सन्यासी की छड़ ने त्याग दिया है। भगवान कृष्ण ने पाठ 16 में अपनी पत्नी के खिलाफ दो विशिष्ट आरोप भी लगाए। उन्होंने कहा, वैदर्भ्य एतद विज्ञाय - "मेरी प्यारी वैदर्भी, आप स्थिति से अवगत नहीं थीं" - और त्वयादीर्घ-समीक्षया - "क्योंकि आपमें दृष्टि की कमी है।" वर्तमान पद में, रुक्मिणी का कथन iti me vrto 'si इंगित करता है "मैंने आपको अपने पति के रूप में चुना क्योंकि आप में उपर्युक्त गुण हैं। यह बिल्कुल भी अंधा विकल्प नहीं था।" रुक्मिणी ने आगे उल्लेख किया है कि वह ब्रह्मा, शिव और स्वर्ग के शासकों जैसे छोटे व्यक्तित्वों पर से गुज़र गई क्योंकि उसने देखा कि भौतिक दृष्टि से बात करें तो, वे महान व्यक्तित्व हैं, वे समय की शक्तिशाली लहरों से निराश होते हैं, जो भगवान कृष्ण की भौंहों से निकलते हैं। इसलिए, दृष्टि की कमी से दूर, रुक्मिणी ने पूरी ब्रह्मांडीय स्थिति के विस्तृत मूल्यांकन के बाद भगवान कृष्ण को चुना। इस प्रकार वह यहाँ अपने पति को प्यार से फटकारती है।

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती रुक्मिणी के मूड की व्याख्या इस प्रकार करते हैं: "मेरे प्रिय पति, आपका यह आरोप कि मुझमें दृष्टि की कमी है, यह इंगित करता है कि आप स्थिति में मेरी गहरी अंतर्दृष्टि को जानते थे। वास्तव में, मैंने आपको इसलिए चुना क्योंकि मैं आपके सच्चे गौरव से अवगत थी।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)