निष्किंचना वयं शश्वान्
निष्किंचन-जना-प्रियाः
तस्मात् प्रायेण न ह्य आढ्या
मां भजन्ति सु-मध्यमे
"हमारे पास कोई भौतिक संपत्ति नहीं है, और हम उन लोगों को प्रिय हैं, जिनके पास उसी तरह कुछ नहीं है। इसलिए, हे पतली कमर वाली, धनी लोग मेरी पूजा शायद ही कभी करते हैं।"
रानी रुक्मिणी ने अपने वक्तव्य की शुरुआत निष्किंचनो ननु कहकर की है, "तुम निश्चित रूप से निष्किंचन हो।" किंचन शब्द का अर्थ "कुछ" होता है, और उपसर्ग निर - या, जैसा कि यहाँ प्रकट होता है, निष - नकारात्मकता को इंगित करता है। इस प्रकार सामान्य अर्थ में निष्किंचन का अर्थ है "जिसके पास कुछ नहीं है", या दूसरे शब्दों में, "जिसके पास कुछ नहीं है।"
लेकिन वर्तमान श्लोक में रानी रुक्मिणी कहती हैं कि भगवान कृष्ण के पास "कुछ भी नहीं है" इसलिए नहीं कि वह गरीब हैं बल्कि इसलिए कि वह स्वयं सर्वस्व हैं। दूसरे शब्दों में, क्योंकि कृष्ण पूर्ण सत्य हैं, जो कुछ भी मौजूद है वह उन्हीं के भीतर है। उनके पास रखने के लिए कोई दूसरी चीज़ नहीं है, भगवान के अस्तित्व के बाहर कुछ भी नहीं है। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति के पास एक घर या एक कार या एक बच्चा या धन हो सकता है, लेकिन ये चीजें व्यक्ति नहीं बनती हैं: वे उसके बाहर मौजूद होती हैं। हम कहते हैं कि वह केवल इस अर्थ में उनका मालिक है कि उसका उन पर नियंत्रण है। लेकिन प्रभु केवल अपनी सृष्टि को नियंत्रित नहीं करते हैं: उनकी सृष्टि वास्तव में उनके भीतर मौजूद है। इस प्रकार उनके बाहर कुछ भी नहीं है जिसे वह उस तरह से अपना सकते हैं जैसे हम बाहरी वस्तुओं को अपनाते हैं।
आचार्य निषकिंचन की व्याख्या निम्नलिखित प्रकार से करते हैं: यह कहना कि किसी व्यक्ति के पास कुछ है इसका तात्पर्य है कि उसके पास सब कुछ नहीं है।
दूसरे शब्दों में, अगर हम कहते हैं कि किसी व्यक्ति के पास कुछ संपत्ति है, तो हम इसका तात्पर्य यह है कि उसके पास सारी संपत्ति नहीं है, बल्कि कुछ विशिष्ट संपत्ति है। एक मानक अमेरिकी शब्दकोश कुछ शब्द को "एक निश्चित अनिश्चित या अनिर्दिष्ट संख्या, मात्रा आदि, को बाकी से अलग के रूप में परिभाषित करता है।" संस्कृत शब्द किंचन कुल की एक आंशिक राशि की इस भावना को व्यक्त करता है। इस प्रकार भगवान कृष्ण को निष्किंचन इसलिए कहा जाता है ताकि इस विचार का खंडन किया जा सके कि उनके पास केवल एक निश्चित मात्रा में सुंदरता, प्रसिद्धि, धन, बुद्धि और अन्य वैभव हैं। बल्कि उनके पास अनंत सौंदर्य, अनंत बुद्धि, अनंत धन इत्यादि हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह पूर्ण सत्य हैं।
श्रील प्रभुपाद ने श्रीमद-भागवतम के प्रथम खंड, प्रथम खंड की अपनी प्रस्तावना की शुरुआत निम्नलिखित कथन के साथ की है, जो हमारी वर्तमान चर्चा के लिए काफी प्रासंगिक है: "ईश्वर की अवधारणा और पूर्ण सत्य की अवधारणा एक ही स्तर पर नहीं है। श्रीमद-भागवतम पूर्ण सत्य के लक्ष्य पर प्रहार करता है। ईश्वर की अवधारणा नियंत्रक को इंगित करती है, जबकि पूर्ण सत्य की अवधारणा परम कल्याण या सभी ऊर्जा के अंतिम स्रोत को इंगित करती है।" यहाँ श्रील प्रभुपाद एक मौलिक दार्शनिक बिंदु को छूते हैं। ईश्वर को सामान्यतः "परम सत्ता" के रूप में परिभाषित किया गया है, और शब्दकोश सर्वोच्च को परिभाषित करता है (1) रैंक, शक्ति, अधिकार आदि में सबसे ऊपर;(2) गुणवत्ता, उपलब्धि, प्रदर्शन आदि में सबसे ऊपर;(3) डिग्री में सबसे ऊपर; और (4) अंतिम, परम। इनमें से कोई भी परिभाषा पर्याप्त रूप से पूर्ण अस्तित्व को इंगित नहीं करती है।
उदाहरण के लिए, हम कह सकते हैं कि एक विशेष अमेरिकी इस अर्थ में सर्वोच्च रूप से धनी है कि वह किसी भी अन्य अमेरिकी से अधिक धनी है, या हम सर्वोच्च न्यायालय को भूमि में सर्वोच्च न्यायालय के रूप में बोल सकते हैं, हालांकि यह निश्चित रूप से सभी में पूर्ण अधिकार नहीं रखता है। राजनीतिक और सामाजिक मामले, क्योंकि यह इन क्षेत्रों में विधायिका और राष्ट्रपति के साथ अधिकार साझा करता है। दूसरे शब्दों में, सर्वोच्च शब्द पदानुक्रम में सर्वश्रेष्ठ को इंगित करता है, और इस प्रकार सर्वोच्च सत्ता को केवल सभी प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ या महान के रूप में समझा जा सकता है, लेकिन अन्य सभी प्राणियों के स्रोत के रूप में नहीं और वास्तव में, जो कुछ भी मौजूद है। इस प्रकार श्रील प्रभुपाद विशेष रूप से बताते हैं कि पूर्ण सत्य की अवधारणा, कृष्ण, एक सर्वोच्च प्राणी की अवधारणा से अधिक है, और यह बिंदु वैष्णव दर्शन की स्पष्ट समझ के लिए आवश्यक है।
भगवान कृष्ण केवल एक परम सत्ता नहीं हैं: वे पूर्ण सत्ता हैं, और यही वह बिंदु है जो उनकी पत्नी बता रही हैं। इस प्रकार निष्किंचन शब्द यह नहीं दर्शाता कि कृष्ण के पास कोई वैभव नहीं है बल्कि सभी वैभव हैं। उस अर्थ में वह खुद की निष्किंचन की परिभाषा को स्वीकार करती हैं।
पाठ 14 में भगवान कृष्ण ने यह भी कहा, निष्किंचन-जन-प्रियाः: "मैं उन लोगों को प्रिय हूँ जिनके पास कुछ नहीं है।" यहाँ, हालाँकि, महारानी रुक्मिणी इस ओर इशारा करती हैं कि ब्रह्मांड में सबसे धनी आत्माएँ, देवता नियमित रूप से परमेश्वर को भेंट चढ़ाते हैं। हम यह मान सकते हैं कि देवता, भगवान के नियुक्त प्रतिनिधि होने के नाते, जानते हैं कि सब कुछ उसी का है इस अर्थ में कि सब कुछ उसी का अंग है, जैसा कि ऊपर बताया गया है। इसलिए निष्किंचन-जन-प्रियाः कथन इस अर्थ में सही है कि चूँकि भगवान और उनकी शक्तियों को छोड़कर कुछ भी अस्तित्व में नहीं है, चाहे भगवान के उपासक कितने भी धनी प्रतीत हों, वे वास्तव में उन्हें उनकी अपनी ऊर्जा से कुछ भी नहीं चढ़ा रहे हैं एक प्रेममय कार्य के रूप में। यही विचार का उदाहरण तब दिया जाता है जब कोई गंगा नदी को गंगा जल चढ़ाकर पूजा करता है, या जब एक बच्चा अपने पिता के जन्मदिन पर अपने पिता से पैसे लेकर उसे एक उपहार खरीदता है। पिता अपने ही वर्तमान के लिए भुगतान कर रहे हैं, लेकिन वास्तव में उनकी रुचि अपने बच्चे के प्यार में है। उसी प्रकार, परमेश्वर ब्रह्मांड को प्रकट करते हैं, और फिर शर्तों वाली आत्माएँ भगवान की रचना की विभिन्न वस्तुओं को एकत्र करती हैं। धर्मनिष्ठ आत्माएँ अपने संग्रह से भगवान को बलिदान के रूप में कुछ श्रेष्ठ चीज़ें प्रदान करती हैं और इस प्रकार स्वयं को शुद्ध करती हैं। चूँकि समूचा ब्रह्मांड और उसमें सब कुछ केवल भगवान की ऊर्जा है, हम कह सकते हैं कि भगवान की पूजा करने वालों के पास कुछ भी नहीं है।
अधिक पारंपरिक शब्दों में, अपनी महान संपत्ति पर गर्व करने वाले लोग ईश्वर को प्रणाम नहीं करते। महारानी रुक्मिणी भी इन मूर्खों का उल्लेख करती हैं। अपने अस्थायी शरीर से संतुष्ट, वे मृत्यु की दिव्य शक्ति को नहीं समझते, जो उनका पीछा करती है। हालाँकि, देवता, जो अब तक के सबसे धनी जीवित प्राणी हैं, नियमित रूप से परमेश्वर को बलिदान चढ़ाते हैं, और इस प्रकार भगवान जैसा कि यहाँ कहा गया है, उन्हें सबसे प्रिय हैं।
