तस्मिनन्तर्गृहे भ्राजन्मुक्तादामविलम्बिना ।
विराजिते वितानेन दीपैर्मणिमयैरपि ॥ ३ ॥
मल्लिकादामभि: पुष्पैर्द्विरेफकुलनादिते ।
जालरन्ध्रप्रविष्टैश्च गोभिश्चन्द्रमसोऽमलै: ॥ ४ ॥
पारिजातवनामोदवायुनोद्यानशालिना ।
धूपैरगुरुजै राजन् जालरन्ध्रविनिर्गतै: ॥ ५ ॥
पय:फेननिभे शुभ्रे पर्यङ्के कशिपूत्तमे ।
उपतस्थे सुखासीनं जगतामीश्वरं पतिम् ॥ ६ ॥
अनुवाद
महारानी रुक्मिणी के कक्ष अत्यंत मनमोहक थे। उसमें मोतियों के चमकते हुए झुंड के साथ एक चंदोवा लटका हुआ था, और चमकदार रत्न दीपों का कार्य कर रहे थे। उसमें इधर-उधर चमेली और अन्य फूलों की मालाएँ लटकी हुई थीं, जो भनभनाते हुए भौरों के झुंडों को आकर्षित कर रही थीं और चंद्रमा की निर्मल किरणें जालीदार खिड़कियों के छेदों से चमक रही थीं। हे राजन्, जब इन खिड़कियों के छेदों से अगुरु की सुगंध बाहर निकलती तो पारिजात कुंज की सुगंध को ले जाने वाली मंद वायु कमरे के भीतर एक बगीचे का वातावरण बना देती। इस कमरे में महारानी समस्त लोकों के स्वामी अपने पति की सेवा कर रही थीं, जो उनके मुलायम और दूध के झाग जैसे सफेद बिस्तर पर एक शानदार तकिये के सहारे बैठे थे।
Queen Rukmini's rooms were very beautiful. From a chandelier hung strings of pearls and brilliant gems acted as lamps. Here and there hung garlands of jasmine and other flowers, attracting flocks of humming bees, and the pure rays of the moon shone through the holes in the latticed windows. O King, when the fragrance of aguru wafted out of these holes, the gentle breeze carrying the fragrance of the Parijata Kunj created the atmosphere of a garden within the room. In this room the Queen was serving her husband, the Lord of all the worlds, who was seated on a luxurious cushion on his soft and milk-white bed.
तात्पर्य
श्रील श्रीधर स्वामी के अनुसार, रुकमणि का महल तब भी प्रसिद्ध था और आज भी प्रसिद्ध है, और ये वर्णन उसकी संपन्नता को झलकाते हैं। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं कि इस श्लोक में अमलैः शब्द को अरुणैः के रूप में भी पढ़ा जा सकता है, जो बताता है कि जब यह पास्टाइम हुआ था तो चंद्रमा अभी-अभी उगा था, जो पूरे महल को सुंदर सुर्ख चाँदनी से नहला रहा था।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥