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bhagavat 10.60.27-28: शोक के आँसुओं से भरे उनके नेत्रों और स्तनों को पोंछते हुए, अपने भक्तों के लक्ष्य सुप्रीम भगवान ने अपनी पतिव्रता पत्नी का आलिंगन किया जो केवल उन्हें ही चाहती थीं, हे राजा। शांति स्थापित करने की कला में निपुण, श्री कृष्ण ने दयनीय रुक्मिणी का कोमलता से दिल बहलाया जिनका मन भगवान् के चतुराईपूर्ण हास-परिहास से भ्रमित था और जो इस तरह के कष्ट सहन करने के योग्य नहीं थीं।   |   bhagavat अध्याय 10.60: रुक्मिणी के साथ कृष्ण का परिहास   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 60: रुक्मिणी के साथ कृष्ण का परिहास  »  श्लोक 27-28
 
 
श्लोक  10.60.27-28 
प्रमृज्याश्रुकले नेत्रे स्तनौ चोपहतौ शुचा ।
आश्लिष्य बाहुना राजननन्यविषयां सतीम् ॥ २७ ॥
सान्‍त्‍वयामास सान्‍त्‍वज्ञ: कृपया कृपणां प्रभु: ।
हास्यप्रौढिभ्रमच्चित्तामतदर्हां सतां गति: ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
शोक के आँसुओं से भरे उनके नेत्रों और स्तनों को पोंछते हुए, अपने भक्तों के लक्ष्य सुप्रीम भगवान ने अपनी पतिव्रता पत्नी का आलिंगन किया जो केवल उन्हें ही चाहती थीं, हे राजा। शांति स्थापित करने की कला में निपुण, श्री कृष्ण ने दयनीय रुक्मिणी का कोमलता से दिल बहलाया जिनका मन भगवान् के चतुराईपूर्ण हास-परिहास से भ्रमित था और जो इस तरह के कष्ट सहन करने के योग्य नहीं थीं।
 
Wiping her tearful eyes and her breasts stained with tears of anguish, O King, the Lord, the goal of His devotees, embraced His chaste wife who desired Him alone. Master in the art of consolation, Sri Krishna gently consoled the pitiful Rukmini, whose mind was bewildered by the Lord's clever humor and who was not capable of being so tormented.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)