श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 60: रुक्मिणी के साथ कृष्ण का परिहास  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  10.60.17 
अथात्मनोऽनुरूपं वै भजस्व क्षत्रियर्षभम् ।
येन त्वमाशिष: सत्या इहामुत्र च लप्स्यसे ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
अतः अब विशाल सोच वाले, सभ्य रीति-रिवाज वाले किसी उपयुक्त उच्च-कोटि के व्यक्ति के प्रस्ताव को स्वीकार करने का समय है, जो तुम्हें इस जीवन में और इसके बाद वाली जिंदगी में भी हर ऐसी चीज प्राप्त करने में सहायता कर सकता है जिसकी तुम कभी कल्पना भी नहीं कर सकती।
 
Now you should accept a more suitable person, a high class king, who can help you achieve everything you desire in this life as well as the next.
तात्पर्य
भगवान कृष्ण अपनी सुंदर पत्नी को चिढ़ाते रहते हैं, उनके प्रेम व शृंगारिक क्रोध की परीक्षा लेते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)