श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 60: रुक्मिणी के साथ कृष्ण का परिहास  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  10.60.12 
राजभ्यो बिभ्यत: सुभ्रु समुद्रं शरणं गतान् ।
बलवद्भ‍ि: कृतद्वेषान् प्रायस्त्यक्तनृपासनान् ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
हे सुन्दर भौंहों वाली, इन राजाओं के भय से हमने समुद्र में शरण ली। हम शक्तिशाली लोगों के दुश्मन बन गए और हमने अपने शाही सिंहासन को लगभग त्याग दिया था।
 
O one with beautiful eyebrows, frightened by these kings we took refuge in the sea. We became the enemy of powerful men and almost abandoned our royal throne.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती इस पद का अर्थ इस प्रकार करते हैं: "यहाँ राधा की मनोवृत्ति को इस प्रकार समझा जा सकता है: 'जब मैंने रुकमणि को स्वर्ग के पारिजात वृक्ष से केवल एक फूल दिया था, तो सत्यभामा ने इस प्रकार क्रोध किया कि मैं उन्हें उनके चरणों में गिरकर भी शांत नहीं कर पाया था। जब मैंने उन्हें संपूर्ण पारिजात वृक्ष दिया तभी वे संतुष्ट हुईं। किन्तु रुकमणि ने जब मुझे सत्यभामा को संपूर्ण वृक्ष देते हुए देखा तब उन्हें कुछ भी क्रोध नहीं आया। तो मैं किसे अपनी इस पत्नी से क्रोधित वचनों का रस ले सकता हूँ, जिन्हें कभी ईर्ष्या नहीं होती, जो परम संयमी हैं और जो सदैव प्रिय बोलती हैं?' इस प्रकार विचार करते हुए सर्वोच्च भगवान ने तय किया कि, 'यदि मैं उनसे इस प्रकार बात करूँगा, तो मैं उन्हें क्रोधित कर सकूँगा।' इस प्रकार कुछ अधिकारी रुकमणि से कृष्ण की कही ये बातें समझाते हैं।" आचार्य के अनुसार, यहाँ शब्द बलवद्भिः कृत-द्वेषान प्रायाः इंगित करते हैं कि भगवान कृष्ण ने अपने अवतार के दौरान लगभग सभी समकालीन राजाओं का विरोध किया था, केवल कुछ से मित्रता की थी, जैसे पाण्डव और उनके वंश के वफादार सदस्य। अवश्य ही, जैसा कि दशम खंड की शुरुआत में कहा गया है, भगवान कृष्ण विशेष रूप से इसलिए प्रकट हुए थे क्योंकि पृथ्वी असंख्य छद्म राजाओं से बोझिल थी और वे इस बोझ को हटाना चाहते थे। अंत में, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती इंगित करते हैं कि शब्द त्यक्त-नृपासनान्, "राजगद्दी का त्याग करना," इंगित करता है कि कंश को मारने के बाद भगवान कृष्ण ने विनम्रतापूर्वक अपने दादा उग्रसेन को राज सिंहासन दे दिया, यद्यपि सिंहासन का अधिकार भगवान का स्वयं था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)