श्री बादरायणि ने कहा : एक बार अपनी दासियों के साथ महारानी रुक्मिणी अपने पति, ब्रह्माण्ड के आध्यात्मिक गुरु, भगवान श्री कृष्ण की सेवा कर रही थीं। वे उनके बिस्तर पर विश्राम कर रहे थे और महारानी रुक्मिणी उनकी सेवा में पंखा झल रही थीं।
Sri Badarayani said: Once Queen Rukmini, accompanied by her maids, was attending to her husband, the spiritual master of the universe. He was resting on his bed and she was fanning him.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ने काव्यात्मक रूप से उल्लेख किया है कि इस अध्याय में रुक्मिणीदेवी भगवान कृष्ण के भाषण के वाट यंत्र में कुचले गए सुगंधित कपूर की तरह हैं। दूसरे शब्दों में, रुक्मिणी के प्यारे, पवित्र गुण भगवान कृष्ण के स्पष्ट रूप से असंवेदनशील शब्दों के परिणामस्वरूप प्रकट होंगे, जैसे कि कपूर के कणों के एक पेराई पत्थर द्वारा कुचलने पर कपूर की सुगंध प्रकट होती है। आचार्य आगे बताते हैं कि रुक्मिणी स्वयं भगवान की सेवा कर रही है क्योंकि वह जगत-गुरुम, ब्रह्मांड के आध्यात्मिक गुरु और पतिम, उनके पति हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥