श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 6: पूतना वध  »  श्लोक 27-29
 
 
श्लोक  10.6.27-29 
डाकिन्यो यातुधान्यश्च कुष्माण्डा येऽर्भकग्रहा: ।
भूतप्रेतपिशाचाश्च यक्षरक्षोविनायका: ॥ २७ ॥
कोटरा रेवती ज्येष्ठा पूतना मातृकादय: ।
उन्मादा ये ह्यपस्मारा देहप्राणेन्द्रियद्रुह: ॥ २८ ॥
स्वप्नद‍ृष्टा महोत्पाता वृद्धा बालग्रहाश्च ये ।
सर्वे नश्यन्तु ते विष्णोर्नामग्रहणभीरव: ॥ २९ ॥
 
 
अनुवाद
डाकिनी, यातुधानी और कुष्मांडा जैसी दुष्ट डाइनें बच्चों की सबसे बड़ी शत्रु हैं। भूत, प्रेत, पिशाच, यक्ष, राक्षस और विनायक जैसी दुष्टात्माओं के साथ कोटरा, रेवती, ज्येष्ठा, पूतना और मातृका जैसी डाइनें भी सदैव शरीर, प्राण और इंद्रियों को कष्ट पहुँचाने के लिए तैयार रहती हैं। इनसे स्मृति की हानि, उन्माद और बुरे सपने उत्पन्न होते हैं। ये दुष्ट अनुभवी वृद्धों की तरह बच्चों के लिए विशेष रूप से बहुत परेशानी खड़ा करते हैं। लेकिन भगवान विष्णु के नाम के उच्चारण मात्र से ही इन्हें नष्ट किया जा सकता है। जब भगवान विष्णु का नाम प्रतिध्वनित होता है, तो ये सभी डर जाते हैं और भाग जाते हैं।
 
The evil witches named Dakini, Yaatudhaani and Kusmanda are the greatest enemies of children and the evil spirits like Bhuta, Pret, Pishacha, Yaksha, Rakshasa and Vinayaka along with the witches like Kotra, Revati, Jyeshtha, Putana and Matrikas are always ready to torment the body, life and senses causing loss of memory, hysteria and bad dreams. These wicked ones, like experienced old men, create great trouble especially for children. But they can be destroyed only by chanting the name of Lord Vishnu because when the name of Lord Vishnu resounds, they all become afraid and run away.
तात्पर्य
जैसाकि ब्रह्म-संहिता (5.33) में कहा गया है:

अद्वैतं अच्युतम अनादि अनंत-रूपम्

आद्यम् पुराण-पुरुषम् नव-यौवनम् च

वेदेशु दुर्लभम् अदुर्लभम् आत्म-भक्तौ

गोविन्दम् आदि-पुरुषम् तम् अहम् भजामि

"मैं भगवान गोविंद की आराधना करता हूँ जो परम व्यक्तित्व हैं - अद्वैत(अद्वितीय), अच्युत(अचूक), और अनादि(अनादि)। यद्यपि वह असीमित रूपों में विस्तारित होते हैं, फिर भी वह मूल हैं, और यद्यपि वह सबसे प्राचीन व्यक्ति हैं, फिर भी वह हमेशा एक नव युवक के रूप में प्रकट होते हैं। भगवान के ऐसे शाश्वत, आनंदमय और सर्वज्ञ रूपों को वेदों के शैक्षणिक ज्ञान से नहीं समझा जा सकता है, किंतु वे हमेशा शुद्ध, निष्कलंक भक्तों पर प्रकट होते हैं।"

तिलक से शरीर को सजाते समय हम विष्णु के बारह नामों का जाप करके शरीर को सुरक्षा प्रदान करते हैं। यद्यपि गोविंद, या भगवान विष्णु, एक हैं, लेकिन उनके अलग-अलग नाम और रूप हैं जिनके साथ वे अलग-अलग कार्य करते हैं। लेकिन अगर कोई एक समय में सभी नामों को याद नहीं रख पाता है, तो वह बस "भगवान विष्णु, भगवान विष्णु, भगवान विष्णु" का जाप कर सकता है, और हमेशा भगवान विष्णु के बारे में सोच सकता है। विष्णोर आराधनं परम्: यह पूजा का सर्वोच्च रूप है। यदि कोई विष्णु को हमेशा याद रखता है, भले ही वह कई बुरे तत्वों से परेशान हो, तो वह निस्संदेह सुरक्षित रह सकता है। आयुर्वेद-शास्त्र अनुशंसा करता है, औषधि चिंतेत विष्णुम्: दवा लेते समय भी विष्णु को याद रखना चाहिए, क्योंकि दवा ही सब कुछ नहीं है और विष्णु ही वास्तविक रक्षक हैं। भौतिक दुनिया खतरे से भरी हुई है (पदम् पदम् यद् विपदाम)। इसलिए व्यक्ति को वैष्णव बनना चाहिए और विष्णु के बारे में लगातार सोचना चाहिए। हरे कृष्ण महा-मंत्र के जाप से यह सरल हो जाता है। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने अनुशंसा की है, कीर्तनीयः सद हरीः परम् विजयते श्री-कृष्ण-संकर्तनम्, और कीर्तनाद एव कृष्णस्य मुक्त-संगः परम व्रजेत।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)