अद्वैतं अच्युतम अनादि अनंत-रूपम्
आद्यम् पुराण-पुरुषम् नव-यौवनम् च
वेदेशु दुर्लभम् अदुर्लभम् आत्म-भक्तौ
गोविन्दम् आदि-पुरुषम् तम् अहम् भजामि
"मैं भगवान गोविंद की आराधना करता हूँ जो परम व्यक्तित्व हैं - अद्वैत(अद्वितीय), अच्युत(अचूक), और अनादि(अनादि)। यद्यपि वह असीमित रूपों में विस्तारित होते हैं, फिर भी वह मूल हैं, और यद्यपि वह सबसे प्राचीन व्यक्ति हैं, फिर भी वह हमेशा एक नव युवक के रूप में प्रकट होते हैं। भगवान के ऐसे शाश्वत, आनंदमय और सर्वज्ञ रूपों को वेदों के शैक्षणिक ज्ञान से नहीं समझा जा सकता है, किंतु वे हमेशा शुद्ध, निष्कलंक भक्तों पर प्रकट होते हैं।"
तिलक से शरीर को सजाते समय हम विष्णु के बारह नामों का जाप करके शरीर को सुरक्षा प्रदान करते हैं। यद्यपि गोविंद, या भगवान विष्णु, एक हैं, लेकिन उनके अलग-अलग नाम और रूप हैं जिनके साथ वे अलग-अलग कार्य करते हैं। लेकिन अगर कोई एक समय में सभी नामों को याद नहीं रख पाता है, तो वह बस "भगवान विष्णु, भगवान विष्णु, भगवान विष्णु" का जाप कर सकता है, और हमेशा भगवान विष्णु के बारे में सोच सकता है। विष्णोर आराधनं परम्: यह पूजा का सर्वोच्च रूप है। यदि कोई विष्णु को हमेशा याद रखता है, भले ही वह कई बुरे तत्वों से परेशान हो, तो वह निस्संदेह सुरक्षित रह सकता है। आयुर्वेद-शास्त्र अनुशंसा करता है, औषधि चिंतेत विष्णुम्: दवा लेते समय भी विष्णु को याद रखना चाहिए, क्योंकि दवा ही सब कुछ नहीं है और विष्णु ही वास्तविक रक्षक हैं। भौतिक दुनिया खतरे से भरी हुई है (पदम् पदम् यद् विपदाम)। इसलिए व्यक्ति को वैष्णव बनना चाहिए और विष्णु के बारे में लगातार सोचना चाहिए। हरे कृष्ण महा-मंत्र के जाप से यह सरल हो जाता है। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने अनुशंसा की है, कीर्तनीयः सद हरीः परम् विजयते श्री-कृष्ण-संकर्तनम्, और कीर्तनाद एव कृष्णस्य मुक्त-संगः परम व्रजेत।
