श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 6: पूतना वध  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  10.6.21 
गोप्य: संस्पृष्टसलिला अङ्गेषु करयो: पृथक् ।
न्यस्यात्मन्यथ बालस्य बीजन्यासमकुर्वत ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
गोपियों ने प्रथम में अपने दाहिने हाथ का पानी एक घूँट भरकर आचमन किया। वे न्यास-मंत्र से अपने शरीर और हाथों को शुद्ध करते हुए, उस मंत्र का उच्चारण करते हुए बच्चे के शरीर को भी शुद्ध कर रही थीं।
 
The gopis first sipped water with their right hands and rinsed their mouths. They purified their bodies and hands with the nyasa mantra and then they purified the boy's body with the same mantra.
तात्पर्य
न्यास-मंत्र में आचमन शामिल है, या दाहिने हाथ में रखे पानी का पहला घूँट पीना। शरीर को शुद्ध करने के लिए विभिन्न विष्णु-मंत्र हैं। गोपियाँ, और वास्तव में कोई भी गृहस्थ, वैदिक भजनों का जप करके शुद्ध होने की प्रक्रिया जानती थीं। गोपियों ने सबसे पहले खुद को शुद्ध करने के लिए और फिर बाल कृष्ण को शुद्ध करने के लिए इस प्रक्रिया को अंजाम दिया। एक व्यक्ति केवल थोड़ा सा पानी पीकर और मंत्र का जप करके अंग-न्यास और कर-न्यास की प्रक्रिया को अंजाम देता है। मंत्र नाम के पहले अक्षर से पहले होता है, इसके बाद अनुस्वार और शब्द नमः: ओम नमो ’जस तवांघ्री अव्यात, मं मनो मणिमंस् तव जानुनी अव्यात, इत्यादि होता है। भारतीय संस्कृति को खोने से, भारतीय गृहस्थ अंग-न्यास का निष्पादन करना भूल गए हैं और मानव सभ्यता के किसी भी उन्नत ज्ञान के बिना, केवल इंद्रिय तृप्ति में व्यस्त हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)