श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 59: नरकासुर का वध  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  10.59.43 
गृहेषु तासामनपाय्यतर्ककृ-
न्निरस्तसाम्यातिशयेष्ववस्थित: ।
रेमे रमाभिर्निजकामसम्प्लुतो
यथेतरो गार्हकमेधिकांश्चरन् ॥ ४३ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान, जो अचिन्तनीय कार्य करते हैं, निरंतर अपनी प्रत्येक रानी के महलों में रहे, जो किसी भी अन्य आवास की तुलना में अद्वितीय और श्रेष्ठ थे। वहाँ, उन्होंने अपनी मनोहर पत्नियों के साथ आनंद लिया, यद्यपि वे अपने आप में पूर्ण रूप से संतुष्ट हैं, उन्होंने एक सामान्य पति की तरह अपने घरेलू कर्तव्यों का पालन किया।
 
The Lord, who performs unimaginable deeds, resided eternally in the palaces of each of His queens, which were unparalleled in comparison with any other residence. There He enjoyed the company of His beautiful wives, although He remained fully satisfied with Himself and performed His domestic duties like an ordinary husband.
तात्पर्य
वचन atarka-kṛt यहाँ उल्लेखनीय है। तर्क का अर्थ होता है, "तर्क" और atarka का अर्थ होता है, "जो तर्क से परे हो।" भगवान (kṛt) वह कर सकते हैं जो कि सांसारिक तर्क से परे हो और इसलिए अकल्पनीय हो। फिर भी, भगवान की गतिविधियों की प्रशंसा की जा सकती है और उनको समझा जा सकता है जो लोग उनके समर्पण करते हैं। यही भक्ति का रहस्य है, सर्वोच्च भगवान के प्रति प्रेम भरा समर्पण।

श्रील श्रीधर स्वामी कहते हैं कि भगवान हमेशा घर पर रहते थे, सिवाय उस समय के जब उन्हें सामान्य घरेलू कर्तव्यों को करने के लिए बाहर जाना पड़ता था। और श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती बताते हैं कि वैकुण्ठ ग्रहों में भगवान नारायण केवल सौभाग्य की एक देवी के साथ आनंद लेते हैं और द्वारका में कृष्ण हजारों रानियों के साथ आनंद लेते हैं, द्वारका को वैकुण्ठ से श्रेष्ठ माना जाना चाहिए। इस संबंध में श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ने स्कंदपुराण से निम्नलिखित अंश भी उद्धृत किया है:

षोडशैव सहस्राणि

गोप्यस्त्वत्र समाागताः

हंस एव मतो कृष्णः

परमात्मा जनार्दनः

तस्यैताः शक्तयो देवि

षोडशैव प्रकीर्तिताः

चंद्र-रूपी मतो कृष्णः

कला-रूपास्तु ताः स्मृताः

संपूर्ण-मंडलार्तासां

मालिनी षोडशी कला

षोडशैव कला यासु

गोपी-रूपा वरांंगने

एकाईकशस्ताः संभिन्नाः

सहस्रेण पृथक् पृथक्

"उस स्थान पर सोलह हज़ार गोपियाँ कृष्ण के साथ एकत्र हुई थीं, जिन्हें सर्वोच्च, अतिआत्मा, सभी जीवों का आश्रय माना जाता है। ये गोपियाँ उनकी प्रसिद्ध सोलह शक्तियाँ हैं, हे देवी। कृष्ण चंद्रमा की तरह हैं, गोपियाँ उसके चरणों की तरह हैं, और गोपियों का पूरा दल चंद्रमा के सोलह चरणों के पूर्ण अनुक्रम की तरह है। गोपियों के इन सोलह विभागों में से प्रत्येक, मेरे प्रिय वरांगना, एक हज़ार भागों में विभाजित है।"

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती पद्म पुराण के कार्तिक-माहात्म्य खंड का आगे उद्धरण देते हैं: कैशोरे गोप-कन्यास्तां यौवने राज-कन्यकाः। "जो अपनी प्रारंभिक अवस्था में (चरण में) चरवाहों की बेटियाँ थीं, उनकी परिपक्व अवस्था में वे शाही राजकुमारियाँ बन गईं।" आचार्य आगे कहते हैं, "इसलिए जैसे द्वारका के भगवान श्री वृंदावन के सर्वोच्च पूर्ण भगवान के पूर्ण विस्तार हैं, इसलिए उनकी प्रमुख रानियाँ उनकी सर्वोच्च पूर्ण आनंद शक्तियों, गोपियों के पूर्ण विस्तार हैं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)