श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 59: नरकासुर का वध  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  10.59.42 
अथो मुहूर्त एकस्मिन् नानागारेषु ता: स्‍त्रिय: ।
यथोपयेमे भगवान् तावद् रूपधरोऽव्यय: ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
तब उस अविनाशी महापुरुष ने प्रत्येक वधू के लिए अलग रूप धारण करते हुए एक साथ सारी राजकुमारियों से उन्हीं के महलों में विवाह कर लिया।
 
Then that indestructible great man, assuming a different form for each bride, married all the princesses simultaneously in their respective palaces.
तात्पर्य
जैसे कि श्रील श्रीधर स्वामी समझाते हैं, यहाँ यथा शब्द यह दर्शाता है कि प्रत्येक विवाह का विधिवत आयोजन किया गया था। इसका मतलब यह है कि उनकी माता देवकी सहित भगवान के सभी रिश्तेदारों का दल प्रत्येक महल में उपस्थित हुआ और हर एक विवाह में भाग लिया। चूंकि ये सभी विवाह एक साथ हुए थे, इसलिए यह घटना निश्चित रूप से भगवान की अचिंत्य शक्ति का प्रकटीकरण थी।

जब भगवान कृष्ण कुछ करते हैं, तो वे इसे भव्य तरीके से करते हैं। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं है कि भगवान एक साथ 16,100 विवाह समारोहों में प्रकट हुए जो 16,100 शाही महलों में हो रहे थे, प्रत्येक महल में उनके सभी रिश्तेदारों के साथ। वास्तव में, इसी तरह से व्यक्ति सर्वोच्च ईश्वर के कार्य करने की अपेक्षा करेगा। आखिरकार, वे एक साधारण मनुष्य नहीं हैं।

श्रील श्रीधर स्वामी आगे बताते हैं कि इस विशेष अवसर पर भगवान ने अपने प्रत्येक महल में अपना मूल रूप प्रकट किया। दूसरे शब्दों में, विवाह की प्रतिज्ञा में भाग लेने के लिए, उन्होंने सभी महलों में समान रूप (प्रकाश) प्रकट किए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)