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bhagavat 10.59.22: भूमि पर गिरे हुए भौमासुर का सिर तेजी से चमक रहा था क्योंकि यह कुण्डलों तथा आकर्षक मुकुट से सज्जित था। जैसे ही “हाय हाय” तथा “बहुत अच्छा हुआ” के क्रन्दन गूंजने लगे, त्योंही ऋषियों तथा प्रमुख देवताओं ने फूल-मालाओं की वर्षा करते हुए भगवान् मुकुन्द की पूजा की।   |   bhagavat अध्याय 10.59: नरकासुर का वध   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 59: नरकासुर का वध  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  10.59.22 
सकुण्डलं चारुकिरीटभूषणं
बभौ पृथिव्यां पतितं समुज्ज्वलम् ।
हा हेति साध्वित्यृषय: सुरेश्वरा
माल्यैर्मुकुन्दं विकिरन्त ईडिरे ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
भूमि पर गिरे हुए भौमासुर का सिर तेजी से चमक रहा था क्योंकि यह कुण्डलों तथा आकर्षक मुकुट से सज्जित था। जैसे ही “हाय हाय” तथा “बहुत अच्छा हुआ” के क्रन्दन गूंजने लगे, त्योंही ऋषियों तथा प्रमुख देवताओं ने फूल-मालाओं की वर्षा करते हुए भगवान् मुकुन्द की पूजा की।
 
The head of Bhaumasur, fallen on the ground, was shining brightly as it was adorned with earrings and a beautiful crown. As cries of “Alas” and “It is very good” arose, the sages and the major deities worshipped Lord Mukunda, showering flowers and garlands on him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)