श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 58: श्रीकृष्ण का पाँच राजकुमारियों से विवाह  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  10.58.25 
भगवांस्तत्र निवसन् स्वानां प्रियचिकीर्षया ।
अग्नये खाण्डवं दातुमर्जुनस्यास सारथि: ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
अपने भक्तों को प्रसन्न करने के खातिर भगवान उस नगरी में कुछ दिन और रहते रहे। एक बार श्रीकृष्ण ने अग्नि को खाण्डव वन दान में देना चाहा इसलिए वे अर्जुन के सारथी बन गए।
 
To please his devotees, the Lord stayed in that city for some time. On one occasion, Shri Krishna wanted to give Khandav forest as a donation to Agni and hence he became Arjuna's charioteer.
तात्पर्य
श्रील जीव गोस्वामी ने भगवान श्रीकृष्ण के पाण्डवों के यहाँ रहने के दौरान घटित घटनाओं के क्रम की व्याख्या की है | उन्होंने कहा है कि सबसे पहले खाण्डव-वन जलाया गया था, उसके बाद कालिंदी नदी का पता लगाया गया था, फिर नगर का निर्माण किया गया और अंत में पाण्डवों को सभा-मंडप दिया गया था |
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)