नान्यं पतिं वृणे वीर तमृते श्रीनिकेतनम् ।
तुष्यतां मे स भगवान् मुकुन्दोऽनाथसंश्रय: ॥ २१ ॥
अनुवाद
भगवान् मुकुन्द, जो कि दीन दुखियों के आश्रय हैं, और वे ही लक्ष्मी देवी के पति हैं, मैं उनके अलावा किसी और को अपना पति स्वीकार नहीं करूँगी। वे मुझ पर दया करें।
I will not accept any other husband except him who is the abode of goddess Lakshmi. May Lord Mukunda, who is the refuge of orphans, be pleased with me.
तात्पर्य
यहाँ सुन्दरी कालिंदी कुछ चिन्ता व्यक्त करती है। वह इस बात पर जोर देती है कि वह भगवान कृष्ण को छोड़कर किसी अन्य पति को स्वीकार नहीं करेगी, और कहती है कि जो लोग बेसहारा होते हैं उनके लिए वह एक आश्रय है। चूंकि वह कोई अन्य आश्रय नहीं स्वीकार करेगी, इसलिए कृष्ण को उसे आश्रय देना चाहिए। इसके साथ ही वह कहती है, तुष्यतां मे स भगवान: "उस परमेश्वर को मुझ पर प्रसन्न होना चाहिए।" यह उसकी प्रार्थना है।
जैसा कि श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती बताते हैं, यद्यपि कालिंदी एक युवा, असहाय लड़की है जो एक सुनसान जगह में रहती है, लेकिन उसे डर नहीं है। भगवान कृष्ण में यह अडिग विश्वास और भक्ति आदर्श कृष्ण चेतना है, और श्रीमती कालिंदी की इच्छा जल्द ही पूरी होगी।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥