श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 57: सत्राजित की हत्या और मणि की वापसी  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  10.57.4 
योऽस्मभ्यं सम्प्रतिश्रुत्य कन्यारत्नं विगर्ह्य न: ।
कृष्णायादान्न सत्राजित् कस्माद् भ्रातरमन्वियात् ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
"सत्राजित ने वादा किया और फिर तिरस्कारपूर्वक उसकी अवहेलना करते हुए, अपनी मणि-सी कन्या हमें दिए बिना ही श्री कृष्ण को दे दी। तो फिर सत्राजित का भी वही हाल क्यों न हो जो उसके भाई का हुआ?"
 
“Satrajit, having promised, disregarded us and gave his precious daughter to Krishna instead of giving her to us. Then why should Satrajit not follow the path of his brother?”
तात्पर्य
चूंकि सत्रजित के भाई प्रसेन की हत्या हिंसक तरीके से कर दी गयी थी, "अपने भाई के पथ का अनुसरण करने" का निहितार्थ स्पष्ट है। यहाँ पर हमारे पास हत्या की साजिश है।

यह सर्वविदित है कि अक्रूर और कृतवर्मा दोनों ही श्रेष्ठ, परम भगवान के शुद्ध भक्त हैं, तो उनके इस असाधारण व्यवहार के लिए कुछ स्पष्टीकरण की आवश्यकता है। आचार्य निम्नलिखित स्पष्टीकरण देते हैं: श्रील जीव गोस्वामी बताते हैं कि अक्रूर, यद्यपि वह भगवान के प्रथम श्रेणी के, शुद्ध भक्त थे, गोकुलवासियों के क्रोध के शिकार हो गये थे जिन्होंने कृष्ण भगवान को वृंदावन से दूर ले जाया। गोस्वामी आगे कहते हैं कि कृतवर्मा ने कंस से मेलजोल रखा था - क्योंकि वे दोनों भोज राजवंश के सदस्य थे - और इसलिए कृतवर्मा अब इस अवांछनीय संगति से कष्ट पा रहा था।

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती एक वैकल्पिक स्पष्टीकरण देते हैं: अक्रूर और कृतवर्मा दोनों सत्रजित से बहुत क्रोधित थे क्योंकि उसने कृष्ण भगवान का अपमान किया था और द्वारका में उनके बारे में झूठी अफवाहें फैलायी थीं। सामान्य परिस्थितियों में अक्रूर और कृतवर्मा इस बात से बहुत प्रसन्न हुए होते कि कृष्ण भगवान ने सुंदर सत्यभामा से विवाह किया है। क्योंकि शुद्ध भक्त होने के कारण वे वास्तव में इस विवाह से नाखुश नहीं हो सकते थे, और न ही वे भगवान के प्रतिद्वंद्वी ईर्ष्यालु बन सकते थे। इसलिए उनके इस प्रकार भगवान के प्रतिद्वंद्वी की तरह व्यवहार करने के पीछे कोई छिपा हुआ मकसद था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)