इत्यङ्गोपदिशन्त्येके विस्मृत्य प्रागुदाहृतम् ।
मुनिवासनिवासे किं घटेतारिष्टदर्शनम् ॥ ३१ ॥
अनुवाद
कुछ लोगों ने प्रस्ताव दिया [कि ये आपदाएँ अक्रूर की अनुपस्थिति के कारण हैं], लेकिन वे भगवान की उन महिमाओं को भूल गये थे जिनका वर्णन वे प्रायः स्वयं करते थे। सचमुच, उस स्थान पर विपत्तियाँ कैसे आ सकती हैं जहाँ समस्त मुनियों के आश्रय रूप भगवान निवास करते हैं?
Some people even proposed [that these calamities were due to the absence of Akrura]: but they had forgotten the glories of the Lord, which He Himself often described. Indeed, how can calamities befall a place where the Lord, the shelter of all sages, dwells?
तात्पर्य
श्रीला विश्वनाथ चक्रवर्ती इस पद्य पर निम्नलिखित अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं: बनारस में अक्रूर स्वर्ण वेदियों पर यज्ञ करने और ब्राह्मणों को भरपूर दान देने के लिए प्रसिद्ध हो गए थे। जब द्वारका के नागरिकों ने इस बारे में सुना, तो उनमें से कुछ ने गपशप की कि कृष्ण, अक्रूर को प्रतिद्वंद्वी मानते हुए, उन्हें निर्वासन में भेज दिया था। अपनी प्रतिष्ठा पर इस नए और अविश्वसनीय दाग को दूर करने के लिए, भगवान कृष्ण ने द्वारका में विभिन्न आपदाएँ पैदा कीं, इस प्रकार नागरिकों को अक्रूर की वापसी के लिए बुलाने के लिए प्रेरित किया, जिसे तब भगवान ने आदेश दिया।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥