श्रील श्रीधर स्वामी के अनुसार, अक्रूर ने स्यमंतक मणि ली और बनारस शहर में रहने चले गए, जहाँ उन्हें दानपति, "दान के स्वामी" के रूप में जाना जाने लगा। वहां उन्होंने योग्य पुजारियों की विस्तृत सभाओं के साथ सोने की वेदियों पर अग्नि यज्ञ किए।
द्वारका के कुछ निवासियों ने महसूस किया कि असामान्य आपदाएँ अक्रूर की अनुपस्थिति के कारण थीं, जिसे (जैसा कि अगले श्लोक में वर्णित है) भूल गए कि द्वारका में सर्वोच्च भगवान की व्यक्तिगत उपस्थिति उस संभावना को रोक देती है। क्योंकि जब भगवान पृथ्वी पर आते हैं तो उनके मनोरंजन मानव प्राणियों की तरह होते हैं, "परिचय अवमानना को जन्म देता है" का सिद्धांत चलन में आता है। ऐसा प्रतीत होता है कि कई संत व्यक्तियों और भगवान के अवतारों के जीवन के दौरान हमेशा ऐसे लोगों का एक वर्ग मौजूद होता है जो उनके बीच महान आत्माओं की स्थिति की सराहना करने में या केवल कभी-कभार सराहना करने में विफल होते हैं। दूसरी ओर, भाग्यशाली और प्रबुद्ध आत्माएँ जो भगवान और उनके सहयोगियों की सही स्थिति को पहचानती हैं, वे अत्यधिक धन्य हैं।
