श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 57: सत्राजित की हत्या और मणि की वापसी  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  10.57.18 
प्रत्याख्यात: स तेनापि शतधन्वा महामणिम् ।
तस्मिन् न्यस्याश्वमारुह्य शतयोजनगं ययौ ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
अक्रूर द्वारा भी उसकी प्रार्थना अस्वीकार किए जाने पर, शतधन्वा ने वह अनमोल रत्न अक्रूर की देखभाल में रख दिया और एक घोड़े पर सवार होकर भाग गया जो एक सौ योजन (आठ सौ मील) की यात्रा कर सकता था।
 
When Akrura also refused his request, Shatadhanva left the priceless gem under the protection of Akrura and fled on a horse that could travel a hundred yojanas (eight hundred miles).
तात्पर्य
न्यास्य, "किसी की देखरेख में छोड़ना" शब्द का तात्पर्य है कि शतध्नवा अब मानता था कि गहना उसी का है; इसलिए वह इसे एक दोस्त की देखभाल में छोड़ रहा था। सीधे शब्दों में, यह एक चोर की मानसिकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)