श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 56: स्यमन्तक मणि  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  10.56.22 
स वै भगवता तेन युयुधे स्वामिनात्मन: ।
पुरुषं प्राकृतं मत्वा कुपितो नानुभाववित् ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
अपने असली पद से अनभिज्ञ और उन्हें एक सामान्य व्यक्ति समझकर जाम्बवान अपने स्वामी भगवान के साथ क्रोधित होकर लड़ने लगे।
 
Unaware of his real status and considering him to be an ordinary man, Jambavan became angry and started fighting with his master, the Lord.
तात्पर्य
पुरुषं प्राकृतं मतवा, "उसे एक सांसारिक व्यक्ति समझते हुए", शब्द बहुत महत्वपूर्ण हैं। पश्चिमी लोगों सहित तथाकथित वैदिक विद्वान, परुषम शब्द का भगवान कृष्ण के लिए संदर्भित होते हुए भी "मनुष्य" के रूप में अनुवाद करने का आनंद लेते हैं, और इस प्रकार वैदिक साहित्य का उनका अनधिकृत अनुवाद ईश्वर की उनकी भौतिकवादी अवधारणाओं से दूषित है। हालाँकि, यहाँ यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह इसलिए था क्योंकि जाम्बवान भगवान की स्थिति को गलत समझते थे कि उन्होंने उन्हें प्राकृत-पुरुष, "एक सांसारिक व्यक्ति" माना था। दूसरे शब्दों में, भगवान वास्तव में पुरुषोत्तम हैं, "अंतिम पारलौकिक व्यक्ति"।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)