Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 bhagavat 10.56.12: एक मौके पर प्रभु कृष्ण ने सत्राजित से कहा कि वह ये रत्न यदुराज उग्रसेन को दे दे, किन्तु सत्राजित इतना लालची था कि उसने देने से मना कर दिया। उसने इस बात की गंभीरता पर ध्यान नहीं दिया कि भगवान के अनुरोध को ठुकराने से उसे कितना भारी अपराध हो रहा है। | bhagavat अध्याय 10.56: स्यमन्तक मणि । bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ । श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
स याचितो मणिं क्वापि यदुराजाय शौरिणा ।
नैवार्थकामुक: प्रादाद् याच्ञाभङ्गमतर्कयन् ॥ १२ ॥
अनुवाद
एक मौके पर प्रभु कृष्ण ने सत्राजित से कहा कि वह ये रत्न यदुराज उग्रसेन को दे दे, किन्तु सत्राजित इतना लालची था कि उसने देने से मना कर दिया। उसने इस बात की गंभीरता पर ध्यान नहीं दिया कि भगवान के अनुरोध को ठुकराने से उसे कितना भारी अपराध हो रहा है।
On one occasion Lord Krishna requested Satrajit to give it to Yaduraja Ugrasena, but Satrajit was so greedy that he refused. He did not consider the gravity of the offense caused by refusing the Lord's request.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥