यत्रासौ संस्थितः कृष्णस्त्रिभिः शक्त्या समाहितः
रामानिरुद्ध-प्रद्युम्नायरुक्मिण्या सहितो विभुः
"यहां [द्वारका में] सर्वशक्तिमान भगवान कृष्ण अपनी पूरी शक्ति से युक्त हैं और अपने तीन पूर्ण विस्तारों- बलराम, अनिरुद्ध और प्रद्युम्न के साथ रहते हैं।" कृष्ण संदर्भ श्रीमद भागवतम के वर्तमान श्लोक के संदर्भ में बताते हुए आगे बताता है कि "कामदेव जिसे रुद्र ने अपने क्रोध से जला दिया वह इंद्र के अधीन एक देवता है। यह देवता कामदेव, प्रोटोटाइप कामदेव, प्रद्युम्न का आंशिक प्रकटीकरण है जो वासुदेव का पूर्ण विस्तार है। देव कामदेव, अपने आप एक नया शरीर प्राप्त करने में असमर्थ होने के कारण प्रद्युम्न के शरीर में प्रवेश किया। अन्यथा कामदेव को लगातार निरंतर अवतार रहित स्थिति में रहना पड़ता, जो रुद्र के क्रोध से भस्म होने का परिणाम होता।"
श्रीमद-भागवतम (1.14.30 तात्पर्य) के अपने अंग्रेजी अनुवाद में, श्रील प्रभुपाद प्रद्युम्न, भगवान कृष्ण के पहले पुत्र की पूर्ण स्थिति की पुष्टि करते हैं: "प्रद्युम्न और अनिरुद्ध भी भगवान के पूर्ण विस्तार हैं, और इस तरह ये भी विष्णु-तत्व हैं। द्वारका में भगवान वासुदेव अपने पूर्ण विस्तारों के साथ अपने अलौकिक विहार में लगे हुए हैं, अर्थात् संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध, और इसलिए उनमें से प्रत्येक को भगवान के रूप में संबोधित किया जा सकता है, ..."
श्रील श्रीधर स्वामी के अनुसार, प्रद्युम्न का जन्म रुक्मिणी के गर्भ से हुआ था जो कृष्ण के जामवंती से विवाह से पहले था और भगवान के अन्य विवाह हुए थे। बाद में, प्रद्युम्न शंबर के महल से लौटा। लेकिन इससे पहले कि शुकदेव गोस्वामी कृष्ण के अन्य पत्नियों के साथ उनके विहारों के बारे में बताते हैं, वह निरंतरता के लिए प्रद्युम्न की पूरी कहानी सुनाएंगे।
श्रील श्रीधर स्वामी आगे नोट करते हैं कि कामदेव, या कामदेव, जो अब प्रद्युम्न के भीतर प्रकट हो रहा है, वासुदेव का एक हिस्सा है क्योंकि वह चित्त, चेतना के तत्व से प्रकट हुआ है, जिसकी अध्यक्षता वासुदेव करते हैं, और इसलिए भी कि वह (कामदेव) भौतिक पीढ़ी का कारण है। जैसा कि भगवान ने भगवद-गीता (10.28) में कहा है, प्रजनास चस्मी कांडर्पा: "पूर्वजों में मैं कांडर्पा [कामदेव] हूं।"
