अर्थेऽह्यविद्यमानेऽपि
संशृतिर्निवर्तते
ध्यायतो विषयानास्य
स्वप्नेऽनर्थागमो यथा
"जो इंद्रिय संतुष्टि पर ध्यान लगा रहा है, उसके लिए भौतिक जीवन, भले ही तथ्यात्मक अस्तित्व का अभाव हो, समाप्त नहीं होता, जैसे सपने में आने वाले अप्रिय अनुभव समाप्त नहीं होते।"
