श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 54: कृष्ण-रुक्मिणी विवाह  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  10.54.48 
यथा शयान आत्मानं विषयान् फलमेव च ।
अनुभुङ्क्ते ऽप्यसत्यर्थे तथाप्नोत्यबुधो भवम् ॥ ४८ ॥
 
 
अनुवाद
जैसे एक सोया हुआ व्यक्ति स्वप्न के भ्रम के दौरान अपने-आप, इंद्रिय-सुखों की वस्तुओं और अपने कर्मों के फलों को अनुभव करता है, उसी प्रकार एक अज्ञानी व्यक्ति भौतिक अस्तित्व का अनुभव करता है।
 
Just as a sleeping person experiences himself, his sense-objects and the results of his actions under the illusion of a dream, similarly an ignorant person attains this world.
तात्पर्य
जैसा कि श्रुतियों में कहा गया है, असंगो ह्ययं पुरुषः: "जीवित प्राणी का भौतिक संसार से कोई अंतरंग संबंध नहीं है।" इस बिंदु की व्याख्या वर्तमान श्लोक में की गई है। श्रीमद-भागवतम (11.22.56) में भी ऐसा ही कथन मिलता है:

अर्थेऽह्यविद्यमानेऽपि

संशृतिर्निवर्तते

ध्यायतो विषयानास्य

स्वप्नेऽनर्थागमो यथा

"जो इंद्रिय संतुष्टि पर ध्यान लगा रहा है, उसके लिए भौतिक जीवन, भले ही तथ्यात्मक अस्तित्व का अभाव हो, समाप्त नहीं होता, जैसे सपने में आने वाले अप्रिय अनुभव समाप्त नहीं होते।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)