श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 54: कृष्ण-रुक्मिणी विवाह  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  10.54.46 
नात्मनोऽन्येन संयोगो वियोगश्चासत: सति ।
तद्धेतुत्वात्तत्प्रसिद्धेर्द‍ृग्‌रूपाभ्यां यथा रवे: ॥ ४६ ॥
 
 
अनुवाद
हे बुद्धिमान देवी, आत्मा कभी भी असत् भौतिक पदार्थों के संपर्क में नहीं आती और न ही उनसे अलग होती है, क्योंकि आत्मा ही उनकी उत्पत्ति और प्रकाशक है। इस तरह आत्मा सूर्य के समान है, जो न तो कभी दृष्टि और दृश्य के संपर्क में आता है और न ही उनसे अलग होता है।
 
O wise goddess, the soul never comes in contact with the unreal material objects nor is it separated from them because the soul is their origin and illuminator. In this way, the soul is like the sun, which never comes in contact with the visual sense (eye) and the visible form, nor is it separated from them.
तात्पर्य
जैसा पूर्ववर्ती पाठ में समझाया गया है, आत्मा से अनभिज्ञ व्यक्ति स्वयं को भौतिक शरीर मान लेता है और इस प्रकार जन्म और मृत्यु के चक्र में घूमता रहता है। वास्तव में, पदार्थ और आत्मा हर चीज के मूल स्रोत भगवान के साथ ऊर्जा हैं, जो निरपेक्ष सत्य हैं।

जैसा कि भगवान कृष्ण ने भगवद-गीता (7.5) में समझाया है, जीव-भूतं महा-बाहो ययेदं धार्यते जगत्। भौतिक संसार विशाल प्राणियों की इसे शोषण करने की इच्छा से बनी हुई है। भौतिक संसार एक जेल की तरह है। अपराधी अपराध करने के लिए दृढ़ होते हैं, और इस प्रकार सरकार को जेल प्रणाली बनाए रखना आवश्यक लगता है। इसी प्रकार, भगवान भौतिक संसारों को बनाए रखते हैं क्योंकि आत्माएं उनके विरुद्ध विद्रोह करने के लिए दृढ़ हैं और उनके प्यार भरे सहयोग के बिना आनंद लेने की कोशिश करती हैं। इस प्रकार यहां वाक्यांश तद-धेतुत्वत् का उपयोग आत्मा का वर्णन करने के लिए किया गया है, जिसका अर्थ है कि आत्मा भौतिक शरीर में इकट्ठा होने वाले पदार्थ का कारण है। शब्द तत-प्रसिद्धेह बताता है कि आत्मा शरीर के देखे जाने का कारण है, और वही शब्द यह भी इंगित करता है कि यह तथ्य ज्ञानियों के लिए अच्छी तरह से जाना जाता है।

इस श्लोक में अपने दिए गए अर्थ के अलावा, शब्द ātmanaḥ इस श्लोक में परम आत्मा को संकेत कर सकता है, जिस स्थिति में शब्द तद-धेतुत्वत् इंगित करता है कि भगवान कृष्ण अपनी व्यक्तिगत शक्ति का विस्तार करते हैं और इस प्रकार भौतिक ब्रह्मांड को प्रकट करते हैं। चूंकि भगवान अपने शुद्ध, आध्यात्मिक शरीर में अनंत काल से विद्यमान हैं, इसलिए वे कभी भी भौतिक नहीं बनते, जैसा कि यहां इंगित किया गया है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)