श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 54: कृष्ण-रुक्मिणी विवाह  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  10.54.45 
देह आद्यन्तवानेष द्रव्यप्राणगुणात्मक: ।
आत्मन्यविद्यया क्लृप्त: संसारयति देहिनम् ॥ ४५ ॥
 
 
अनुवाद
यह भौतिक शरीर, जिसके शुरू और अंत हैं, का निर्माण भौतिक तत्वों, इंद्रियों और प्रकृति के गुणों से हुआ है। इस शरीर के रूप में भौतिक अज्ञानता द्वारा आत्मा पर थोपे जाने के कारण ही व्यक्ति को जन्म और मृत्यु के चक्र का अनुभव करना पड़ता है।
 
यह भौतिक शरीर, जिसके शुरू और अंत हैं, का निर्माण भौतिक तत्वों, इंद्रियों और प्रकृति के गुणों से हुआ है। इस शरीर के रूप में भौतिक अज्ञानता द्वारा आत्मा पर थोपे जाने के कारण ही व्यक्ति को जन्म और मृत्यु के चक्र का अनुभव करना पड़ता है।
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