श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 54: कृष्ण-रुक्मिणी विवाह  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  10.54.42 
तवेयं विषमा बुद्धि: सर्वभूतेषु दुर्हृदाम् ।
यन्मन्यसे सदाभद्रं सुहृदां भद्रमज्ञवत् ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
[बलराम ने रुक्मिणी से कहा] : तुम्हारी दृष्टिकोण सही नहीं है, क्योंकि तुम एक मूर्ख की तरह उनका भला चाहती हो जो सभी प्राणियों के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं और जिन्होंने तुम्हारे सच्चे शुभचिंतकों के साथ बुरा व्यवहार किया है।
 
[Balarama said to Rukmini]: Your attitude is not correct because, like an ignorant person, you wish well for those who are inimical to all living entities and who have wronged your real well-wishers.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)