रुक्म्यमर्षी सुसंरब्ध: शृण्वतां सर्वभूभुजाम् ।
प्रतिजज्ञे महाबाहुर्दंशित: सशरासन: ॥ १९ ॥
अहत्वा समरे कृष्णमप्रत्यूह्य च रुक्मिणीम् ।
कुण्डिनं न प्रवेक्ष्यामि सत्यमेतद् ब्रवीमि व: ॥ २० ॥
अनुवाद
क्रोध और कुंठा से भरे महाबाहु रुक्मी ने कवच पहनकर और धनुष उठाकर सभी राजाओं के सामने शपथ ली थी, "अगर मैं युद्ध में कृष्ण को मार कर रुक्मिणी को अपने साथ वापस नहीं ले आता तो मैं फिर कुण्डिन नगर में प्रवेश नहीं करूँगा। मैं यह शपथ आप लोगों के समक्ष लेता हूँ।"
The agitated and furious Mahabahu Rukmi, wearing his armour and holding his bow, took this oath in front of all the kings, “If I do not kill Krishna in the war and bring Rukmini back with me, then I will not enter Kundin city again. I take this oath in front of you all.”
तात्पर्य
रुक्मी ने ये क्रोध भरे शब्द कहे और तत्पश्चात भगवान कृष्ण का पीछा करने की ओर चल पड़ा, जैसा कि निम्नलिखित छंदों में वर्णित है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥