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bhagavat 10.54.11: [जरासंध ने कहा] हे पुरुषश्रेष्ठ शिशुपाल, ध्यान से सुनो। अपनी उदासी छोड़ दो। हे राजा, संसार में रहने वाले प्राणियों का सुख और दुख कभी भी एक जैसा नहीं रहता।   |   bhagavat अध्याय 10.54: कृष्ण-रुक्मिणी विवाह   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 54: कृष्ण-रुक्मिणी विवाह  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  10.54.11 
भो भो: पुरुषशार्दूल दौर्मनस्यमिदं त्यज ।
न प्रियाप्रिययो राजन् निष्ठा देहिषु द‍ृश्यते ॥ ११ ॥
 
 
अनुवाद
[जरासंध ने कहा] हे पुरुषश्रेष्ठ शिशुपाल, ध्यान से सुनो। अपनी उदासी छोड़ दो। हे राजा, संसार में रहने वाले प्राणियों का सुख और दुख कभी भी एक जैसा नहीं रहता।
 
[Jarasandha said] O tiger among men, Sisupala, listen. Give up your sadness. O king, the happiness and sorrow of all embodied beings have never been seen to be permanent.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)