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bhagavat 10.53.2: प्रभु श्री कृष्ण ने कहा : रुक्मिणी जिस प्रकार से मेरे प्रति समर्पित है, ठीक उसी प्रकार से मेरा मन भी उसी की ओर खिंचता है। मैं रात में सो तक नहीं पाता। मैं यह भी जानता हूँ की रुक्मी ने द्वेष के कारण हमारे विवाह में बाधा डाली है।   |   bhagavat अध्याय 10.53: कृष्ण द्वारा रुक्मिणी का अपहरण   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 53: कृष्ण द्वारा रुक्मिणी का अपहरण  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  10.53.2 
श्रीभगवानुवाच
तथाहमपि तच्चित्तो निद्रां च न लभे निशि ।
वेदाहं रुक्‍मिणा द्वेषान्ममोद्वाहो निवारित: ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
प्रभु श्री कृष्ण ने कहा : रुक्मिणी जिस प्रकार से मेरे प्रति समर्पित है, ठीक उसी प्रकार से मेरा मन भी उसी की ओर खिंचता है। मैं रात में सो तक नहीं पाता। मैं यह भी जानता हूँ की रुक्मी ने द्वेष के कारण हमारे विवाह में बाधा डाली है।
 
The Lord said: Just as Rukmini's mind is set on me, similarly my mind is set on her. I cannot even sleep at night. I know that Rukmi has stopped our marriage out of enmity.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)