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bhagavat 10.52.8: अपार संपदाओं का त्याग कर भयहीन होते हुए भी भय दिखाते हुए वे अपने कमल-समान चरणों से अनेक योजन पैदल चलते गए।   |   bhagavat अध्याय 10.52: भगवान् कृष्ण के लिए रुक्मिणी-संदेश   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 52: भगवान् कृष्ण के लिए रुक्मिणी-संदेश  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  10.52.8 
विहाय वित्तं प्रचुरमभीतौ भीरुभीतवत् ।
पद्‍भ्यां पद्मपलाशाभ्यां चेलतुर्बहुयोजनम् ॥ ८ ॥
 
 
अनुवाद
अपार संपदाओं का त्याग कर भयहीन होते हुए भी भय दिखाते हुए वे अपने कमल-समान चरणों से अनेक योजन पैदल चलते गए।
 
Leaving behind his abundant wealth, fearlessly but pretending to be afraid, he walked several yojanas on foot with his lotus-like feet.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)