का त्वा मुकुन्द महती कुलशीलरूप-
विद्यावयोद्रविणधामभिरात्मतुल्यम् ।
धीरा पतिं कुलवती न वृणीत कन्या
काले नृसिंह नरलोकमनोऽभिरामम् ॥ ३८ ॥
अनुवाद
हे मुकुंद, वंश, चरित्र, सौंदर्य, ज्ञान, यौवन, ऐश्वर्य और प्रभाव में आप सदैव अपने अनुरूप ही हैं। हे पुरुषों में सिंह, आप सारी मानवता के मन को प्रसन्नता प्रदान करते हैं। समय आने पर ऐसी कौन सी राजकुल की धीरगंभीर और विवाह योग्य कन्या होगी जो आपको पति रूप में नहीं चुनेगी?
O Mukunda, you are the only one equal to yourself in lineage, character, beauty, knowledge, youth, wealth and influence. O lion of men, you delight the mind of all mankind. When the opportune moment arrives, what patient and marriageable girl from a royal family will not choose you as her husband?
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥