श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 51: मुचुकुन्द का उद्धार  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  10.51.61 
विचरस्व महीं कामं मय्यावेशितमानस: ।
अस्त्वेवं नित्यदा तुभ्यं भक्तिर्मय्यनपायिनी ॥ ६१ ॥
 
 
अनुवाद
अपना मन मुझमें डुबोकर तू अपनी इच्छा के अनुसार पृथ्वी पर भ्रमण कर। मुझमें तेरी ऐसी अचल भक्ति सदा बनी रहे।
 
Fix your mind on me and roam around on this earth as you wish. May your unwavering devotion towards me always remain with you.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)