श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 51: मुचुकुन्द का उद्धार  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  10.51.58 
श्रीभगवानुवाच
सार्वभौम महाराज मतिस्ते विमलोर्जिता ।
वरै: प्रलोभितस्यापि न कामैर्विहता यत: ॥ ५८ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान ने कहा: हे सम्राट, महान शासक, तुम्हारा मन शुद्ध एवं समर्थ है। यद्यपि मैंने तुम्हें वरदानों के साथ लुभाने का प्रयास किया, परन्तु तुम्हारा मन भौतिक इच्छाओं के अधीन नहीं हुआ।
 
The Lord said: O Emperor, great King, your mind is pure and powerful. Although I tried to entice you with benedictions, your mind was not overcome by material desires.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)