श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 51: मुचुकुन्द का उद्धार  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  10.51.56 
तस्माद्विसृज्याशिष ईश सर्वतो
रजस्तम:सत्त्वगुणानुबन्धना: ।
निरञ्जनं निर्गुणमद्वयं परं
त्वां ज्ञाप्तिमात्रं पुरुषं व्रजाम्यहम् ॥ ५६ ॥
 
 
अनुवाद
इसलिए हे प्रभु, उन सभी भौतिक इच्छाओं को त्यागकर जो रज, तम और सत्व गुणों से बँधी हुई हैं, मैं आप पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान से शरण लेने के लिए प्रार्थना कर रहा हूँ। आप सांसारिक उपाधियों से ढके हुए नहीं हैं, बल्कि आप शुद्ध ज्ञान से पूर्ण और भौतिक गुणों से परे परम सत्य हैं।
 
Therefore, O Lord, I pray to You, the Supreme Personality of Godhead, to surrender to You, abandoning all material desires which are bound by the modes of passion, ignorance and goodness. You are not disguised by worldly titles, but You are full of pure knowledge and are the Absolute Truth, beyond the material modes of thought.
तात्पर्य
यहाँ 'निर्गुणम्' शब्द इस बात की ओर संकेत करता है कि प्रभु का अस्तित्व भौतिक प्रकृति के गुणों से परे है। कोई तर्क दे सकता है कि भगवान कृष्ण का शरीर भौतिक प्रकृति से बना है, लेकिन यहाँ 'अद्वय' शब्द उस तर्क का खंडन करता है। भगवान कृष्ण के अस्तित्व में कोई द्वंद्व नहीं है। उनका शाश्वत, आध्यात्मिक शरीर कृष्ण है, और कृष्ण ईश्वर हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)