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bhagavat 10.51.52: ऐसा राजा जो पहले से ही प्राप्त शक्ति से भी अधिक शक्ति चाहता है, वह तपस्या करके तथा इन्द्रिय-भोगों का त्याग करके कठोरता से अपने कर्तव्यों का पालन करता है। किन्तु जिसके वेग (इच्छाएँ) इस तरह प्रबल होते हैं कि वह यह सोचता है कि "मैं स्वतंत्र और सर्वोच्च हूँ," वह कभी भी सुख प्राप्त नहीं कर पाता।   |   bhagavat अध्याय 10.51: मुचुकुन्द का उद्धार   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 51: मुचुकुन्द का उद्धार  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  10.51.52 
करोति कर्माणि तप:सुनिष्ठितो
निवृत्तभोगस्तदपेक्षयाददत् ।
पुनश्च भूयासमहं स्वराडिति
प्रवृद्धतर्षो न सुखाय कल्पते ॥ ५२ ॥
 
 
अनुवाद
ऐसा राजा जो पहले से ही प्राप्त शक्ति से भी अधिक शक्ति चाहता है, वह तपस्या करके तथा इन्द्रिय-भोगों का त्याग करके कठोरता से अपने कर्तव्यों का पालन करता है। किन्तु जिसके वेग (इच्छाएँ) इस तरह प्रबल होते हैं कि वह यह सोचता है कि "मैं स्वतंत्र और सर्वोच्च हूँ," वह कभी भी सुख प्राप्त नहीं कर पाता।
 
A king who desires more power than he already has, performs his duties rigorously by performing austerities and abandoning sensual pleasures. But he whose passions (desires) are so strong that he thinks, “I am independent and supreme,” can never attain happiness.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)