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bhagavat 10.51.48: इस भ्रांतिपूर्ण अभिमान के साथ मैंने अपनी पहचान शरीर से जोड़ ली, जोकि भौतिक पदार्थ है, बिल्कुल घड़े या दीवार की तरह। मैंने मानवीय रूप में खुद को भगवान समझा, रथों, हाथियों, अश्वारोहियों, पैदल सैनिकों और सेनापतियों से घिरे मैंने पृथ्वी का भ्रमण किया, और इस भ्रांतिपूर्ण अभिमान में आपको कोई महत्व नहीं दिया।   |   bhagavat अध्याय 10.51: मुचुकुन्द का उद्धार   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 51: मुचुकुन्द का उद्धार  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  10.51.48 
कलेवरेऽस्मिन् घटकुड्यसन्निभे
निरूढमानो नरदेव इत्यहम् ।
वृतो रथेभाश्वपदात्यनीकपै-
र्गां पर्यटंस्त्वागणयन् सुदुर्मद: ॥ ४८ ॥
 
 
अनुवाद
इस भ्रांतिपूर्ण अभिमान के साथ मैंने अपनी पहचान शरीर से जोड़ ली, जोकि भौतिक पदार्थ है, बिल्कुल घड़े या दीवार की तरह। मैंने मानवीय रूप में खुद को भगवान समझा, रथों, हाथियों, अश्वारोहियों, पैदल सैनिकों और सेनापतियों से घिरे मैंने पृथ्वी का भ्रमण किया, और इस भ्रांतिपूर्ण अभिमान में आपको कोई महत्व नहीं दिया।
 
Being very proud, I thought of myself as the body, which is a material object like a pot or a wall. Thinking myself to be a god among men, I roamed the entire earth, surrounded by my charioteers, elephants, horsemen, infantry and generals, insulting You due to my misguided pride.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)