श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 51: मुचुकुन्द का उद्धार  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  10.51.38 
कालत्रयोपपन्नानि जन्मकर्माणि मे नृप ।
अनुक्रमन्तो नैवान्तं गच्छन्ति परमर्षय: ॥ ३८ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजन्, बहुत बड़े ऋषि भी मेरे उन जन्मों और कर्मों का पता नहीं लगा पाते, जो तीनों काल में होते रहते हैं।
 
O King, the greatest of sages keep counting my births and deeds that occur in the three states of time, but they never find its end.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)