श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 51: मुचुकुन्द का उद्धार  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  10.51.32 
चिरप्रजागरश्रान्तो निद्रयापहतेन्द्रिय: ।
शयेऽस्मिन् विजने कामं केनाप्युत्थापितोऽधुना ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
दीर्घकाल तक जागते रहने से मैं थक गया था और नींद से मेरी इन्द्रियाँ मात हो गई थीं। इस प्रकार मैं तब से इस निर्जन स्थान में सुखपूर्वक सोता रहा जब तक कि अभी-अभी किसी ने मुझे जगा नहीं दिया।
 
I was tired due to staying awake for a long time and my senses were overcome by sleep. Thus I have been sleeping comfortably in this deserted place since then, but now someone has woken me up.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)