श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 50: कृष्ण द्वारा द्वारकापुरी की स्थापना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  10.50.44 
रुरोध मथुरामेत्य तिसृभिर्म्‍लेच्छकोटिभि: ।
नृलोके चाप्रतिद्वन्द्वो वृष्णीन्श्रुत्वात्मसम्मितान् ॥ ४४ ॥
 
 
अनुवाद
मथुरा आकर इस यवन ने तीन करोड़ म्लेच्छ सैनिकों के साथ इस नगरी में घेराबंदी कर दी। उसे कभी भी अपने से लड़ने लायक कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं मिला था पर उसने सुना था कि वृष्णिजन उसके बराबर के हैं।
 
Coming to Mathura, this Yavana laid siege to the city with three crore barbarian (Mleccha) soldiers. He had never found a rival capable of fighting against him, but he had heard that the Vrishni people were his equals.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ने कालयवन के इतिहास के संबंध में विष्णु पुराण से उद्धृत किया: "एक बार, गर्ग्य का उसके बहनोई ने नपुंसक कहकर उपहास किया, और जब यादवों ने यह सुना तो वे दिल खोलकर हँसे। उनकी हँसी से क्रोधित होकर, गर्ग्य ने दक्षिण की ओर प्रस्थान किया, यह सोचकर, 'काश मुझे ऐसा पुत्र मिले जो यादवों में आतंक फैलाए।' उसने भगवान महादेव की मिट्टी रूपी लोहे के पाउडर को खाकर पूजा की और बारह वर्षों के बाद उसे अपनी इच्छित मन्नत प्राप्त हुई। आनंदित होकर, वह घर लौट आया।

"बाद में, जब यवनों के निःसंतान राजा ने उससे पुत्र मांगा, तो गर्ग्य ने यवन की पत्नी में एक पुत्र, कालयवन को जन्म दिया। कालयवन में भगवान शिव का महाकाल के रूप में रोष था। एक बार, कालयवन ने नारद से पूछा, 'अब पृथ्वी पर सबसे शक्तिशाली राजा कौन हैं?' नारद ने उत्तर दिया कि यदु। इस प्रकार नारद द्वारा भेजा गया, कालयवन मथुरा में प्रकट हुआ।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)