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श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 50: कृष्ण द्वारा द्वारकापुरी की स्थापना  »  श्लोक 32-33
 
 
श्लोक  10.50.32-33 
स मुक्तो लोकनाथाभ्यां व्रीडितो वीरसम्मत: ।
तपसे कृतसङ्कल्पो वारित: पथि राजभि: ॥ ३२ ॥
वाक्यै: पवित्रार्थपदैर्नयनै: प्राकृतैरपि ।
स्वकर्मबन्धप्राप्तोऽयं यदुभिस्ते पराभव: ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
जरासन्ध का अपमानित होना और फिर राजाओं द्वारा आश्वस्त होना:

जरासन्ध, जिसे योद्धाओं द्वारा बहुत सम्मान दिया जाता था, उसे तब बहुत शर्मिंदगी हुई जब ब्रह्मांड के दोनों स्वामियों ने उसे छोड़ दिया। उसने तपस्या करने का निश्चय किया। लेकिन रास्ते में कई राजाओं ने उसे आध्यात्मिक ज्ञान और सांसारिक तर्कों का उपयोग करके आश्वस्त किया कि उसे आत्म-त्याग के विचार को त्याग देना चाहिए। उन्होंने उससे कहा, "यदुओं द्वारा आपको पराजित किया जाना आपके पिछले कर्मों का स्वाभाविक परिणाम है।"
 
Jarasandha, who was greatly respected by the warriors, was greatly ashamed when both the lords of the universe forsaken him and he decided to perform austerities. But on the way many kings convinced him by spiritual knowledge and worldly arguments that he should give up the idea of ​​self-sacrifice. They told him, “Your defeat by the Yadus is an avoidable result of your past deeds.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)