उत्तर इस प्रकार है: भगवान एक इंसान का किरदार निभाते हैं और अपनी आनंद शक्ति का विस्तार करते हुए, रहस्य और गतिशील क्रिया से भरी रोमांचक पारलौकिक लीलाओं का निर्माण करते हैं। भगवान की योगमाया शक्ति द्वारा, वह बिल्कुल एक इंसान की तरह दिखाई देते हैं, और इस प्रकार हम परम व्यक्ति के सांसारिक मंच पर अभिनय करने के तमाशे का आनंद ले सकते हैं। निस्संदेह, जिद्दी अज्ञेयवादी तर्क देंगे कि चूंकि कृष्ण ईश्वर हैं, इसलिए कोई वास्तविक रहस्य शामिल नहीं है। ऐसे संशयवादी कृष्ण की आकर्षक शक्ति को बिल्कुल नहीं समझते हैं। भौतिक मंच पर भी सौंदर्य और नाटक, अपने स्वयं के आकर्षक तर्क को रखते हैं, और इसी तरह हम कृष्ण को उनके अपने अस्तित्व के लिए प्रेम करते हैं, हम उनके सौंदर्य की उनके अपने अस्तित्व के लिए सराहना करते हैं, और हम कृष्ण की लीलाओं का आनंद लेते हैं क्योंकि वे वास्तव में और अपने आप में अद्भुत हैं। वास्तव में, कृष्ण अपनी लीलाओं को सांसारिक अहंकारी उद्देश्य के लिए नहीं बल्कि हमारे आनंद के लिए निष्पादित करते हैं। इस प्रकार आध्यात्मिक लीलाओं की प्रस्तुति स्वयं प्रेम का एक कार्य है जो कृष्ण शुद्ध हृदय वाली आत्माओं की अनंत आध्यात्मिक खुशी के लिए करते हैं जिन्होंने ईश्वर की भौतिक ईर्ष्या को पार कर लिया है।
इस संबंध में, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती गोपाल-तापनी उपनिषद से एक महत्वपूर्ण श्लोक उद्धृत करते हैं: नराकृति पर-ब्रह्म कारण-मानुषः। "अपने स्वयं के उद्देश्य के लिए, सर्वोच्च पूर्ण सत्य एक मानव जैसी आकृति में प्रकट होता है, हालाँकि वह हर चीज का स्रोत है।" इसी तरह, श्रीमद-भागवतम (10.14.32) में, हम पाते हैं, यन-मित्रं परमानंदं पूर्णं ब्रह्म सनातनम्: "पारलौकिक आनंद का स्रोत, शाश्वत सर्वोच्च ब्रह्म, उनका मित्र बन गया है।"
