श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 50: कृष्ण द्वारा द्वारकापुरी की स्थापना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  10.50.29 
स्थित्युद्भ‍वान्तं भुवनत्रयस्य य:
समीहितेऽनन्तगुण: स्वलीलया ।
न तस्य चित्रं परपक्षनिग्रह-
स्तथापि मर्त्यानुविधस्य वर्ण्यते ॥ २९ ॥
 
 
अनुवाद
जो तीनों लोकों को एक साथ बनाता, पालता और नष्ट करता है और जिसमें असीम दिव्य गुण हैं, उसके लिए शत्रु को परास्त करना आश्चर्यजनक नहीं है। फिर भी जब भगवान मानव के जैसे व्यवहार करते हुए ऐसा करते हैं, तो साधु-संत उनकी लीलाओं को महिमामंडित करते हैं।
 
It is not surprising for the One who simultaneously creates, maintains and destroys the three worlds and who is endowed with infinite divine qualities to suppress the enemy. Yet when the Lord does so while imitating human conduct, the sages praise His deeds.
तात्पर्य
दार्शनिक अरस्तू ने एक बार तर्क दिया था कि सर्वोच्च ईश्वर शायद ही मानवीय गतिविधियों में हिस्सा लेता, क्योंकि सभी साधारण गतिविधियाँ ऐसे दिव्य प्राणी के योग्य नहीं हैं। इसी तरह, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती, जिन्होंने निश्चित रूप से कभी भी अरस्तू के कार्यों को नहीं पढ़ा, एक समान बिंदु उठाते हैं। चूंकि श्री कृष्ण पूरे ब्रह्मांड का निर्माण, रखरखाव और विनाश करते हैं, क्या यह एक अनिच्छुक बेमेल नहीं कहा जाएगा कि जब वह जरासंध के विरुद्ध लड़ते हैं?

उत्तर इस प्रकार है: भगवान एक इंसान का किरदार निभाते हैं और अपनी आनंद शक्ति का विस्तार करते हुए, रहस्य और गतिशील क्रिया से भरी रोमांचक पारलौकिक लीलाओं का निर्माण करते हैं। भगवान की योगमाया शक्ति द्वारा, वह बिल्कुल एक इंसान की तरह दिखाई देते हैं, और इस प्रकार हम परम व्यक्ति के सांसारिक मंच पर अभिनय करने के तमाशे का आनंद ले सकते हैं। निस्संदेह, जिद्दी अज्ञेयवादी तर्क देंगे कि चूंकि कृष्ण ईश्वर हैं, इसलिए कोई वास्तविक रहस्य शामिल नहीं है। ऐसे संशयवादी कृष्ण की आकर्षक शक्ति को बिल्कुल नहीं समझते हैं। भौतिक मंच पर भी सौंदर्य और नाटक, अपने स्वयं के आकर्षक तर्क को रखते हैं, और इसी तरह हम कृष्ण को उनके अपने अस्तित्व के लिए प्रेम करते हैं, हम उनके सौंदर्य की उनके अपने अस्तित्व के लिए सराहना करते हैं, और हम कृष्ण की लीलाओं का आनंद लेते हैं क्योंकि वे वास्तव में और अपने आप में अद्भुत हैं। वास्तव में, कृष्ण अपनी लीलाओं को सांसारिक अहंकारी उद्देश्य के लिए नहीं बल्कि हमारे आनंद के लिए निष्पादित करते हैं। इस प्रकार आध्यात्मिक लीलाओं की प्रस्तुति स्वयं प्रेम का एक कार्य है जो कृष्ण शुद्ध हृदय वाली आत्माओं की अनंत आध्यात्मिक खुशी के लिए करते हैं जिन्होंने ईश्वर की भौतिक ईर्ष्या को पार कर लिया है।

इस संबंध में, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती गोपाल-तापनी उपनिषद से एक महत्वपूर्ण श्लोक उद्धृत करते हैं: नराकृति पर-ब्रह्म कारण-मानुषः। "अपने स्वयं के उद्देश्य के लिए, सर्वोच्च पूर्ण सत्य एक मानव जैसी आकृति में प्रकट होता है, हालाँकि वह हर चीज का स्रोत है।" इसी तरह, श्रीमद-भागवतम (10.14.32) में, हम पाते हैं, यन-मित्रं परमानंदं पूर्णं ब्रह्म सनातनम्: "पारलौकिक आनंद का स्रोत, शाश्वत सर्वोच्च ब्रह्म, उनका मित्र बन गया है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)