तावाह मागधो वीक्ष्य हे कृष्ण पुरुषाधम ।
न त्वया योद्धुमिच्छामि बालेनैकेन लज्जया ।
गुप्तेन हि त्वया मन्द न योत्स्ये याहि बन्धुहन् ॥ १७ ॥
अनुवाद
जरासन्ध ने दोनों की ओर देखा और कहा: रे पुरुषों में अधम कृष्ण, मैं तुझसे अकेले नहीं लड़ना चाहता क्योंकि एक बालक से युद्ध करना लज्जा की बात होगी। रे अपने को छिपाने वाले मूर्ख, अपने सम्बन्धियों की हत्या करने वाले, तू भाग जा! मैं तुझसे युद्ध नहीं करूँगा।
Jarasandha looked at both of them and said: Oh Krishna, the worst of men, I do not want to fight you alone because it would be a matter of shame to fight a child. Oh you fool who keeps himself secret, who kills his relatives, run away! I will not fight you.
तात्पर्य
श्रील श्रीधर स्वामी ने जरासंध के शब्दों की व्याख्या इस प्रकार की है। पुरुषाधम को पुरुषा अधमा यस्मात के रूप में समझा जा सकता है, जिसका अर्थ है "कृष्ण, जिसके लिए सभी पुरुष निम्न हैं।" दूसरे शब्दों में, यहाँ भगवान कृष्ण को "हे पुरुषोत्तम, जीवित प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ" कहकर संबोधित किया जा रहा है। इसी तरह, गुप्तेन, "छिपा हुआ" शब्द भगवान कृष्ण के सभी के दिल में होने और भौतिक दृष्टि से अदृश्य होने के पहलू को इंगित करता है। संस्कृत व्याकरण के अनुसार, तुया मंदा शब्दों को तुया अमंद के रूप में भी विभाजित किया जा सकता है। इस मामले में जरासंध यह संकेत दे रहे हैं कि कृष्ण मूर्ख नहीं हैं बल्कि सबसे सतर्क हैं। बंधु शब्द का प्रयोग जरासंध ने "संबंधी" के अर्थ में किया था, क्योंकि भगवान कृष्ण ने अपने मामा कंस को मार डाला था। हालाँकि, बंधु क्रिया बंध से आया है, "बांधना", और इसलिए बंधु-हान को "अज्ञानता के बंधन को नष्ट करने वाले" के रूप में समझा जा सकता है। इसी तरह, याही, "कृपया जाओ" शब्द इंगित करता है कि भगवान कृष्ण को जीवित प्राणियों से संपर्क करना चाहिए और उन्हें कृष्णभावना से ओतप्रोत होकर आशीर्वाद देना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥